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स्टार बनने की नेम व फेम की दौड़ में मौलिकता हाशिये पर| मुखर हुये हेमवती नंदन भट्ट ‘हेमू ‘

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क भाषा के विविध पहलुओं, सोशल मीडिया की जोरदार एंट्री, कोविड काल आदि विषयों पर वरिष्ठ साहित्यकार, गीतकार व गायक हेमवती नंदन भट्ट हेमू मुखर होकर बोले। सवाल किये तो जवाब खूबसूरत अंदाज दिये गये। बातचीत में लोक भाषा की चिंता भी दिखी तो अगाघ प्रेम भी झलका। सीनियर साहित्यकारों से थोड़ी सी नाराजगी तो नये कलाकारों को नसीहत भी। हेमू दा के भावों के अंदर का असल भाव यही था कि लोक भाषा का संरक्षण हो और मौलिक सृजन कायम रहे। प्रस्तुत है कि वरिष्ठ साहित्यकार हेमवती नंदन भट्ट हेमू से बातचीत के संपादित अंश।

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सवाल-कोविड काल में लोक कलाकार व साहित्यकार कितने प्रभावित हुये हैं।

उत्तर-कोविड-19 विश्वव्यापी संक्रमण के दुष्प्रभाव से सभी वर्ग प्रभावित हुए हैं, इनमें साहित्यकार व कलाकार भी शामिल हैं। जहां तक आर्थिक या सामाजिक गतिविधियों का सवाल है तो किसी भी कलाकार या साहित्यकार के लिए मेरे खयाल से जहां तक इन विषयों की बात है तो इनमें अर्थ मायने नहीं रखता, यदि वह कलाकार व साहित्यकार लोक के प्रति अपने रचनाकर्म व कला से प्रतिबद्ध है तो। मगर हां इससे सामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगा है तो सांस्कृतिक व साहित्यिक आयोजन शत-प्रतिशत तक बंद हो गए हैं। जिससे ऐसे कार्यक्रमों के जरिए लोगों में जो संदेश दिया जाता है वह नहीं जा पा रहा है। धीरे धीरे कोविड 19 का दुष्प्रभाव कम होने पर यह गतिविधियां फिर से अपने सोपान पर होंगी हमें इंतजार करना होगा।


सवाल-सोशल मीडिया का क्रेज बढ़ा है इसे कैसे देखते हैं आप।
उत्तर-जी हां, सोशल मीडिया का क्रेज बढ़ा है। जितना यह प्रचार प्रसार का सशक्त माध्यम बन रहा है उतना ही इसका दुरुपयोग भी हो रहा है। हमें इस माध्यम का इस्तेमाल अच्छी बातों, विचारों के प्रचार प्रसार व उन्हें जन सामान्य तक पहुंचाने के लिए करना चाहिए। तभी इसकी सार्थकता सिद्ध हो सकती है। वर्तमान में ऐसा नहीं दिख रहा है यह माध्यम दुष्प्रचार व बकवास परोसने के लिए अधिक इस्तेमाल होने लगा है। सरकार व प्रशासन को ऐसे लोगों पर पैनी नजर रखनी चाहिए। सवाल-नयी पीढ़ी के साहित्यकार में क्या देखते हैं मौलिकता कितनी है। उत्तर-अच्छे संकेत हैं। कई नवोदित रचनाकार अपने अनुभवों के सापेक्ष बहुत बेहतर लिख रहे हैं। ऐसे लोगों को प्रोत्साहन की जरुरत है। कुछ लोग नकल से काम चलाने वाले तो हर क्षेत्र में होते हैं वह इस क्षेत्र में भी पाए जाते हैं ।


सवाल-नये गीतकार व गायकों के लिए क्या कहना चाहेंगे
उत्तर- नवोदित रचनाकारों को अपनी रचनाओं के विषय व उनकी शब्दावली पर ध्यान देने की आवश्यकता है। कोशिश की जानी चाहिए कि प्रत्येक रचना के माध्यम से समाज को अच्छा संदेश दिया जा सके। सामान्य विषय व उनमें फूहड़ व बेतुके शब्दों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। खासकर उत्तराखंडी गीत-संगीत के क्षेत्र में ऐसे कई महानुभाव अपना इस तरह का हुनर दिखा चुके हैं। नवोदित गायकों को अपनी कला के प्रदर्शन से पहले उसका बेहद सलीके से अभ्यास करना चाहिए, मंच पर चढ़ने व प्रस्तुतिकरण के लिए जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए।
सवाल- नये गीतकार व गायकों में लोक का पुट कितना है और मौलिक सृजन को किस तरह से देखते हैं।

उत्तर- नए गीतकारों व गायकों में लोकपुट व मौलिक रचनाधर्मिता का सर्वथा अभाव झलकता है। मैं इसकी मुख्य वजह लोक के अध्ययन का अभाव व मौलिक के लिए प्रयास नहीं करने को मानता हूं। हां कुछ कलाकार लोकधुनों को जरुर इस्तेमाल कर लेते हैं मगर उन पर जिन गीतों को फिट किया जाता है, उनका स्तर अपेक्षाकृत बेहतर नहीं होता। होना यह चाहिए कि गीत पूरी तरह से मौलिक होना चाहिए और उसका संगीत यानि धुन भी। और लोकगीतों को जिस तरह से पुराने लोग गा चुके हैं उससे और बेहतर ढंग से रखने की कुब्बत हो तभी उनका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मगर ऐसा हो नहीं रहा है। सब रातोंरात स्टार बनने व नेम व फेम पाने के लिए तीन-पांच कर रहे हैं।


सवाल-सोशल मीडिया के प्रचलन में महज नेम-फेम तो नहीं है मौलिक सृजन कितना है।

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उत्तर-मौलिक सृजन काफी कम है, कुछ लोगों की ठीक ठाक रचनाएं कभी कभार देखने पढ़ने को मिलती हैं, बाकी तो सब नकल व कॉपी का खेल चल रहा है, मगर इससे न तो हमारे समाज को फायदा होने वाला है और न ही रचनाकार को स्थायीत्व मिलने वाला है। यह बस कुछेक लोगों को तुष्टिकरण करने का माध्यम मात्र हो सकता है। इससे अधिक कुछ नहीं।
सवाल-सीनियर साहित्यकार नये कलाकारों का कितना मार्गदर्शन कर रहे हैं। उत्तर-देखिए नवोदित कलाकारों में वरिष्ठ लोगों से मार्गदर्शन का चलन व परंपरा यहां कभी रही ही नहीं है। यहां जो अच्छी नकल कर सकता है और जिसके पास कंपनियों को अपने गीत की लॉंचिंग के लिए पैसा होता है वह अपने आप ही उस्ताद बन जाता है। यह परिपाटी आज से नहीं करीब करीब तीन दशक से चल रही है। यदि साहित्यकारों, कवियों से मार्गदर्शन लेने का ट्रेंड होता तो आज पहाड़ी गीत-संगीत के संग्रह में साहित्यिक व समसामयिक रचनाएं अधिक होती और उसका सामाजिक संदेश भी कुछ और ही प्रतिफल दिखाता। मगर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो पाया। यहां बेतुकी तुकबंदियों वाले गीत ज्यादा रिकॉर्ड हुए हैं और लोगों ने ऐसे कलाकारों को हतोत्साहित करने की बजाए प्रोत्साहित करने का कार्य किया है।

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