Kotdwar News….राजकीय महाविद्यालय कण्वघाटी में ‘ गढ़भोज कार्यक्रम ’ पारंपरिक व्यंजनों और संस्कृति से रूबरू हुए विद्यार्थी|कमल उनियाल की Report

सिटी लाइव टुडे, मीडिया हाउस
राजकीय महाविद्यालय कण्वघाटी में ‘गढ़भोज कार्यक्रम’ का भव्य आयोजन, पारंपरिक व्यंजनों और संस्कृति से रूबरू हुए विद्यार्थी
कोटद्वार |
राजकीय महाविद्यालय कण्वघाटी, कोटद्वार में उत्तराखंड की समृद्ध पारंपरिक खाद्य संस्कृति, स्थानीय अनाज एवं पहाड़ी व्यंजनों के संरक्षण तथा उनके पोषण संबंधी महत्व को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से एक विशेष ‘गढ़भोज कार्यक्रम’ का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में विद्यार्थियों ने अत्यधिक उत्साह के साथ भाग लिया और विभिन्न पारंपरिक गढ़वाली व्यंजनों का शानदार प्रदर्शन किया।

राजकीय महाविद्यालय कण्वघाटी में ‘गढ़भोज कार्यक्रम’ का भव्य आयोजन, पारंपरिक व्यंजनों और संस्कृति से रूबरू हुए विद्यार्थी

विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत पारंपरिक व्यंजन
कार्यक्रम के दौरान विभिन्न कक्षाओं के विद्यार्थियों ने अपनी पाक कला और पारंपरिक व्यंजनों की विशेषता को मंच पर प्रस्तुत किया, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल रहे:
- प्रियंशी: अरबी के गुटके, मंडुवे की रोटी एवं तिल की चटनी
- साक्षी रावत: मीठा भात
- करिश्मा पंत: गुलगुले
- सृष्टि बिष्ट: भांग की चटनी
- दीप्ति नेगी: आटे का हलवा
- ज्योति: लोबिया दाल के पराठे और पहाड़ी रायता व पहाड़ी नमक
- अंशिका: उड़द दाल के पकौड़े एवं पाथ्यूड़
- निशा: रोटना
- मेघा रावत: आलू के गुटके
प्रतिभागी विद्यार्थियों ने अपने-أس-अपने व्यंजनों को बनाने की विधि, उनके पारंपरिक उपयोग, स्थानीय महत्व और स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी लाभों की विस्तृत जानकारी साझा की। इससे सभी विद्यार्थियों को अपनी स्थानीय खाद्य परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझने का अनूठा अवसर मिला।


वक्ताओं के विचार
- प्राचार्य महोदय ने अपने संबोधन में कहा कि पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन हमारी सांस्कृतिक पहचान और समृद्ध विरासत के अभिन्न अंग हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से स्थानीय खाद्य पदार्थों और फसलों को संरक्षित करने तथा इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का आह्वान किया। उन्होंने जोर दिया कि पारंपरिक भोजन स्वस्थ जीवनशैली के साथ-साथ स्थानीय कृषि व अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है।
- डॉ. अंजू थपलियाल ने पहाड़ी खाद्य पदार्थों के महत्व पर व्याख्यान देते हुए बताया कि यह भोजन स्थानीय परिस्थितियों और पोषण आवश्यकताओं के अनुकूल विकसित हुआ है।
- डॉ. दीप्ति मैठाणी ने स्थानीय फसलों के संरक्षण को खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत के लिए अत्यंत आवश्यक बताया।
- डॉ. दीपली ने पर्वतीय समाज की संस्कृति में निहित स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों को आधुनिक जीवनशैली में भी उचित स्थान देने पर बल दिया।
- डॉ. हरिओम बहुगुणा और डॉ. ललित बिष्ट ने भी अपने विचार व्यक्त करते हुए नई पीढ़ी में पारंपरिक खाद्य संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने और इसे व्यापक स्तर पर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता जताई।
यह कार्यक्रम विद्यार्थियों में अपनी स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक खाद्य विरासत और पहाड़ी कृषि उत्पादों के प्रति गौरव और जागरूकता उत्पन्न करने में बेहद सफल रहा। इसके माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि स्थानीय भोजन केवल हमारी पहचान का हिस्सा नहीं, बल्कि एक स्वस्थ जीवन और टिकाऊ खाद्य व्यवस्था का मुख्य आधार है।
