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चौबट्टाखाल| बीरोंखाल से हुआ चौबट्टाखाल| लेकिन सरताज़ रहे सतपाल|साभार-वरिष्ठ पत्रकार अजय रावत

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सिटी लाइव टुडे, वरिष्ठ पत्रकार अजय रावत

2002 और 2007 में बीरोंखाल और अब चौबट्टाखाल नाम से जानी जाने वाले पौड़ी जनपद के इस किले ,( 2012 में अमृता के रामनगर पलायन को छोड़ दें तो) पर महाराज दंपति का ही अधिपत्य रहा है। राहुल गांधी के करीबी युवा नेता राजपाल बिष्ट लगातार दो बार इस सीट पर शिकस्त खा चुके हैं। 2002 में महाराज की पत्नी अमृता ने कांग्रेस के निशान पर बीरोंखाल से लड़ते हुए बीजेपी की कल्पेश्वरी को 7836 मतों से करारी शिकस्त दी। उन्होंने एक मर्तबा फिर 2007 में पंजे के निशान पर ही भाजपा की युवा नेत्री दीप्ति रावत को 4113 वोट से परास्त कर विस् की राह पकड़ी। 2012 में नया परिसीमन होने पर पौड़ी जिले की धुमाकोट, बीरोंखाल व थलीसैण का अस्तित्व समाप्त कर चौबट्टाखाल सीट का गठन किया गया, जिसमें पूर्ववर्ती बीरोंखाल के अधिकांश भाग को समाहित किया गया।

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2012 में अमृता यहां से पलायन कर रामनगर चली गईं, तो कांग्रेस ने यहां युवा नेता राजपाल पर दांव खेला, लेकिन बीजेपी के तीर्थ रावत ने राजपाल को महज़ 721 वोट से विधान सभा जाने से रोक दिया। 2017 में पुनः राजपाल कांग्रेस के निशान पर मैदान में उतरे लेकिन इस बार सतपाल महाराज ने बीजेपी के खेमे से मैदान में उतर कर राजपाल को 5194 वोट से पराजित कर डाला। इस मर्तबा भले ही कांग्रेस के टिकट के लिये पूर्व जिपं अध्यक्ष केशर सिंह नेगी ने पूरा जोर लगा रखा है और कहा जाता है मनीष खण्डूरी पूरी तरह से केशर की पैरवी में खड़े हैं लेकिन बावजूद इसके राजनैतिक पंडित हरीश रावत फैक्टर का हवाला देते हुए कांग्रेस सिंबल के लिए राजपाल को ही बीस आंक रहे हैं। बहरहाल कांग्रेस का टिकट किसी को भी मिले लेकिन इस बार महाराज के खिलाफ क्षेत्र में फ़िलवक्त तक जबरदस्त एन्टी इनकमबैंसी बताई जा रही है जो कांग्रेस के लिए सुकून का सबब है, किन्तु इस क्षेत्र में स्थानीय प्रत्याशी जैसा भावनात्मक मसला भी काफ़ी प्रभावी रहता है

ऐसे में यदि कांग्रेस राजपाल या केशर में से किसी एक पर दांव खेलती है तो महाराज या उनके परिवार के किसी सदस्य को चुनौती देना सहज नहीं होगा। साथ ही यह भी नहीं भूलना होगा कि सतपाल का विराट आभामंडल व अकूत संसाधन भी चुनावी परिणाम को बदलने में महत्वपूर्ण कारक साबित हो सकते हैं। फ़िलहाल यहां की हवा कांग्रेस के मुफ़ीद तो है किंतु पार्टी किस प्रबंधन के साथ जंग लड़ती है यह देखना होगा अन्यथा आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि असंतोष के बावजूद महाराज फैमिली ही एक मर्तबा फिर चौबट्टाखाल के किले की सरदार होगी।

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