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गर मसूरी पहुंचें तो समीर भाई के कला जगत को अवश्य देखें |साभार-वरिष्ठ साहित्यकार नरेंद्र कठैत

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सिटी लाइव टुडे, साभार-वरिष्ठ साहित्यकार नरेंद्र कठैत

मसूरी ! पहाड़ पर भव्य नगरी! मौज मस्ती में दौड़ती भागती जिंदगी! किंतु मसूरी से नीचे उतरते हुए किसी भी सज्जन से पूछो कि – मसूरी में सबसे बड़ी दिक्कत क्या महसूस हुई? उत्तर मिलेगा कि- जाम और पार्किंग की। इसी भागती दौड़ती जिंदगी के बीच एक प्रश्न मन में अक्सर कौंधता है कि आखिर इतनी व्यस्ता के बीच कला साहित्य संस्कृति के कितने करीब है यह नगरी?

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आश्चर्य होगा यह जानकर कि- स्थानीय दो प्रमुख पुस्तक विक्रेताओं के पास लगभग 98 प्रतिशत पुस्तकें अंग्रेजी की, एक दो प्रतिशत हिंदी की। लेकिन स्थानीय बोली-भाषा की एक भी नहीं। पूछने पर दोनों विक्रेेताओं ने लगभग एक ही उत्तर दिया- स्थानीय बोली-भाषा की पुस्तकें कोई खरीदता ही नहीं।

माल रोड पर ही सड़क के किनारे प्रशासन की एक ब्रिटिश कालीन भारी भरकम हाथ गाड़ी दर्शनार्थ रखी मिली। ध्यान से देखने पर मालूम पड़ता है कि यह हाथ गाड़ी एक समय में कम से कम हमारे तीन पूर्वजों ने मिलकर दशकों तक ठेली होगी। और भी – यत्र तत्र ही सही! ऐसी ही न जाने कितनी हाथ गाड़ीयां आज म्यूजियमों का हिस्सा होंगी। कहीं न कहीं खतो-किताबात में बैठने
वाली सवारियां भी सूचीबद्ध होंगी। लेकिन खींचने वालों के नाम इत्यादि…….

मन में कौंधते इसी प्रश्न के बीच अचानक सड़क पर धीमी गति से आते एक रिक्शे पर नजर पड़ी। पहाड़ी कद – काठी, सामान्य वेशभूषा, उसे ही रोककर कुछ पूछने की जिज्ञासा बढ़ी। हाथ देते ही उसने मेरे समीप रिक्शा बढातेे-बढ़ाते आवाज दी- जी बाबू जी!

मैंने उसके रिक्शा रोकते ही प्रश्न किया- अरे भुला तू त लोकल लगणी?

उसने उत्तर दिया -हां भैजी ! लोकल ही समझल्या दि! भैरौ आदिम यख रिक्शा खैंच्णू किलै आलू जी? मसूरी मा त रिक्शा खैंचणू त जन हमारी किस्मत मा ही रैगी।

-य बात बि तिन ठीक ही बोली! भुला एक सवाल पुछुण चांदू भुला! अब जब मिन त्वे रोक हि यलि।

-पूछा भैजी?

-त्यरि दिन भरै मजूरी कथगा बण जांदि?

-सौ- द्वी सौ रुपड़ी! अर छुट्या दिन खैंचीखांची तीन सढ़ै तीन ।
-बस इथगी?

-भैजी इथगा बि गनिमत समझा दि। बरखा बतौंण्यूं मा त इथगा बि नि मिल्दि। बस जन कनक्वे ठिल्येणी च जिंदगी। अब तुम इन बता तुमुन जाण कख च भैजी?

-अरे भुला तू इलै रोकि कि यिं भीड़ मा तू अपड़ो से लगी।

-धन्यवाद भैजी!
इन शब्दों के साथ उसने एक मुस्कान बिखरते हुए अपना रिक्शा गन्तव्य की ओर बढ़ा दिया।

वहीं… इसी रोड पर यह भी देखा की एक अदद भुट्टे कीमत पचास रूपये और मटके की चाय साठ रूपये की। कह नहीं सकते यह कीमत वोकल की है अथवा लोकल की। किंतु सत्य कहें तो माल रोड में मुझे रिक्शा खीचते मात्र उसी युवा में अपना स्थानीय साहित्य भी दिखा और अपनी संस्कृति भी।

लेकिन इन तमाम साक्षात दृष्यावलियों के बीच इसी नगरी की एक शख्सियत बरबस ध्यान खींचती रही। वह थी – भाई समीर शुक्ला जी ! SOHAM- THE HIMALAYAN MUSEUM के Founder भी हैं और CEO भी।

सांय लगभग पांच बजे के करीब समीर भाई को फोन पर इत्तला दी। समीर भाई ने जवाब दिया- कठैत जी! स्वागत है! लेकिन पांच बजे के बाद स्टाफ चला जाता है। मैंने कहा- भाई साहब! कोई बात नहीं ! कल उपस्थिति देते हैं! समीर भाई की ओर से पुनः सुनाई दिया। -कठैत जी! क्या कल दस बजे तक आ सकते हैं? क्योंकि दस बजे बाद मुझे देहरादून फिल्म फैस्टिवल में षरीक होने जाना है। लेकिन यदि आपको देर भी होती है तो सैन्टर में कविता जी आपको मिल जायेंगी।

अगले दिन लगभग बारह बजे के करीब समीर भाई के सन् 1997 में स्थापित SOHAM- THE HIMALAYAN MUSEUM में दस्तक दी। मुख्य गेट के समीप ही गणेश जी आदम कद से दुगुनी आकार की हस्तनिर्मित कलात्मक मूर्ति दिखाई दी। इसी मूर्ति के अवलोकन के दौरान सामान्य शिष्टाचार के साथ ही कविता जी ने प्रकट होते ही पंक्ति जोड़ी- जी! यह समीर जी की कल्पना और उसका साकार रूप है! आइये कुछ और अंश देख लीजिए।
कविता जी के इस उदबोधन के साथ SOHAM- THE HIMALAYAN MUSEUM में कदम बढ़ाते बढ़ाते कई स्थानों पर ठिठकने को मजबूर हुए।

इस तीन तल के संग्रहालय में विभिन्न आकृति-प्रकृति के पौराणिक वाद्य यंत्र, गागर, भड्डू एंव माणा-पाथा से लेकर विभिन्न नाप तोल के तांबे पीतल के लुप्त प्रायः बर्तन, तीन सौ से चार सौ साल पुराने हस्तनिर्मित कागजों पर मंत्र, शास्त्र, ऐस्ट्रोलौजी के विवरण, असंख्य जड़ी बूटियों का संग्रहण, जड़ी बूटियों के व्यावसायिक उत्पादन में शोध प्रबन्धन, मंदिर, तीज त्योहारों से संबन्धित पेेंटिग्स, ज्वेलरी, ग्रामोफोन, ग्रामोफोन रिकार्ड, छोटी से बड़ी आकृति के अनगिनत स्क्रेप आर्ट, यहां तक की फटे पुराने जूते पर भी कलात्मक सृजन, दुर्लभ फोटोग्राफ, नकाशीदार सहतीर एंव तिबारी के खम्ब, लुप्प प्रायः कैसेट्स, सी डी। अध्यात्म चेतना के प्रतीक भवन के साथ ही दो मंदिर। समीर भाई और डा. कविता जी की लगभग 25 साल की साधना की एक-एक क्षण की जीवंत तस्वीर।

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25 साल के इस सफर में आपने जीवन के कई रंग देखे होंगे। एक तख्ती पर आपने लिखा भी है कि-‘ ऐलान उसका देखिए वो मजे में है/या तो कोई फकीर है या नशे में है।’ फिर भी आप न झुके हैं, न रूकें। सदैव कर्तव्य पथ पर तत्पर दिखे हैं।

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