उत्तराखंडसंपादकीय

10 साल की वसुधा ने रचा इतिहास: ‘अष्टाध्यायी’ के द्रुत अनुलोम-विलोम पाठ से ‘ इण्डिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ‘ में दर्ज कराया नाम |Click कर पढ़िये पूरी News

Share this news

सिटी लाइव टुडे, मीडिया हाउस

ऋषिकेश, संवाददाता। योगनगरी ऋषिकेश और वैदुष्य-परंपरा को एक बार फिर गौरवान्वित होने का अवसर मिला है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वेदाचार्य की 10 वर्षीया सुपुत्री सुश्री वसुधा भट्टराई ने अपनी अलौकिक स्मरण-शक्ति और अद्भुत प्रतिभा के बल पर महर्षि पाणिनि की व्याकरण साधना को नवीन उत्कर्ष दिया है। उन्होंने महर्षि पाणिनि प्रणीत ‘अष्टाध्यायी’ के जटिल सूत्रों का तीव्रतम गति से अनुलोम (सीधा) और विलोम (उल्टा) क्रम में पाठ कर ‘इण्डिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित कराया है।

मात्र 3 मिनट 6 सेकंड में पूरा किया कठिन पाठ

श्रीमती सुभद्रा देवी और बीएचयू के संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय के वेदविभाग के सहायक आचार्य डॉ. नारायण प्रसाद भट्टराई की ज्येष्ठ पुत्री वसुधा ने मात्र 3 मिनट और 6 सेकंड में यह रिकॉर्ड अपने नाम किया। उन्होंने ‘अष्टाध्यायी’ के प्रथम पाद के समस्त 75 सूत्रों को एक ही प्रयास में सीधे और उल्टे दोनों क्रमों में अविरल सुनाकर सबको चकित कर दिया।

इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स द्वारा इस ऐतिहासिक उपलब्धि की आधिकारिक घोषणा 12 अगस्त 2026 को की गई थी, जिसका प्रमाण पत्र हाल ही में 24 सितंबर 2026 को प्राप्त हुआ है।

कम उम्र में असाधारण उपलब्धियां

  • कनिष्ठ वय में रिकॉर्ड: मात्र 10 वर्ष 22 दिन की अल्पायु में यह उपलब्धि हासिल कर उन्होंने अपनी विलक्षण मेधा और एकाग्रता का परिचय दिया है।
  • प्राचीन ‘शलाका परीक्षा’ विजेता: वर्ष 2025 में काशी के लोलार्क कुंड स्थित शारदा भवन में गणेशोत्सव के अवसर पर आयोजित प्राचीन ‘शलाका परीक्षा’ में भी वसुधा प्रथम स्थान प्राप्त कर चुकी हैं।
  • वर्ल्ड रिकॉर्ड: इससे पहले जून 2026 में वह ‘वर्ल्ड रिकॉर्ड ऑफ इण्डिया’ में भी अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं।
  • शिक्षा: वाराणसी के तुलसी विद्यानिकेतन की कक्षा 4 की छात्रा वसुधा वर्तमान में अपने पिता के मार्गदर्शन में काशी में अध्ययन कर रही हैं।

गुरुजनों और परिजनों में हर्ष का माहौल

विशेषज्ञों के अनुसार, सूत्रों को प्रतिलोम (उल्टे) क्रम में प्रस्तुत करने के लिए केवल रटना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि इसके लिए मस्तिष्क में संपूर्ण ग्रंथ की अचूक मानसिक रूपरेखा और गहरी ध्यान-साधना की आवश्यकता होती है।

ad12

वसुधा की इस स्वर्णिम सफलता पर तुलसी विद्या निकेतन सोसायटी के अध्यक्ष प्रो. विश्वंभरनाथ, विद्यालय के प्राचार्य एवं अन्य शिक्षकों ने उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं और बधाइयां दी हैं। इतनी अल्प आयु में काशी जैसी सर्वविद्या की परंपरा को यह गौरव दिलाना मां भारती और समस्त संस्कृत-अनुरागियों के लिए अत्यंत हर्ष का विषय है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *