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What is the Chaturmas period….शुरू हो चुका है श्री हरि विष्णु का निद्राकाल| Click कर जानिये कब तक रहेगा

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सिटी लाइव टुडे, मीडिया हाउस

हरिद्वार /डरबन। नागा संन्यासी के बड़े अखाड़े निरंजनी अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संत स्वामी रामभजन वन जी महाराज बताते हैं कि धर्म ग्रंथों के अनुसार आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी तक का 4 माह का समय चातुर्मास (Chaturmas 2025 Date) कहलाता है। यह मुख्य रूप से वर्षा ऋतु का समय और भगवान विष्णु का निद्राकाल माना जाता है। इस साल 2025 में देवशयनी एकादशी 6 जुलाई को मनाई गई और देवउठनी एकादशी 1 नवंबर 2025 को है यानी चातुर्मास 6 जुलाई 2025 से 1 नवंबर 2025 तक (What is the Chaturmas period) है।


मान्यता है कि भगवान विष्णु इस समय विश्राम करते हैं और उनकी जगह भोलेनाथ सृष्टि का संचालन करते हैं। इस दौरान सभी तरह के धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, बस विवाह समेत अन्य मांगलिक कार्य नहीं होते हैं। इस दौरान भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करना चाहिए। इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान किए जा सकते हैं पर विवाह समेत मांगलिक काम नहीं होते हैं। अंतरराष्ट्रीय संत स्वामी रामभजन वन जी महाराज के अनुसार धार्मिक दृष्टि से चातुर्मास का ये चार महीना भगवान विष्णु का निद्राकाल माना जाते है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इस दौरान सूर्य और चंद्र का तेज पृथ्वी पर कम पहुंचता है, जल की मात्रा अधिक हो जाती है।


इस समय वातावरण में अनेक जीव-जंतु उत्पन्न हो जाते हैं, जो अनेक रोगों का कारण बनते हैं। इसलिए साधु-संत, तपस्वी इस काल में एक ही स्थान पर रहकर तप, साधना, स्वाध्याय व प्रवचन आदि करते हैं। इसके अलावा लोगों के आने-जाने से जीवों को परेशानी होती है, इस कारण भी संत एक ही जगह पर रहना पसंद करते हैं। स्वामी रामभजन वन जी महाराज के अनुसार चातुर्मास के दौरान पूजा-पाठ, कथा, अनुष्ठान से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। चातुर्मास में भजन, कीर्तन, सत्संग, कथा, भागवत के लिए सबसे अच्छा समय माना जाता है। भगवान विष्णु के विश्राम करने से सभी तरह के मांगलिक कार्य रूक जाते हैं।


इस तरह भगवान श्री नारायण की प्रिय हरिशयनी एकादशी या फिर कहें देवशयनी एकादशी से सभी मांगलिक कार्य जैसे शादी-विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत आदि पर अगले चार मास के लिए विराम लग जाएगा। देवशयनी एकादशी से संन्यासी लोगों का चातुर्मास व्रत आरंभ हो जाता है। चातुर्मास का समापन 1 नवंबर 2025 को होगा।


स्वामी रामभजन वन जी महाराज ने कहा कि चातुर्मास में पूजा और ध्यान करने का विशेष महत्व है। देवशयनी एकादशी से देवप्रबोधनी एकादशी तक भगवान विष्णु विश्राम करेंगे। इस दौरान शिवजी सृष्टि का संचालन करेंगे। इन दिनों में शिवजी और विष्णुजी की पूजा करनी चाहिए। चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु और शिवजी का अभिषेक करना चाहिए। विष्णुजी को तुलसी तो शिवजी को बिल्वपत्र चढ़ाने चाहिए। साथ ही ऊँ विष्णवे नम: और ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करना चाहिए। इन दिनों में भागवत कथा सुनने का विशेष महत्व है। साथ ही जरूरतमंद लोगों को धन और अनाज का दान करना चाहिए।

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चातुर्मास में सबसे पहले सावन का महीना आता है। सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित होता है। इस माह में भगवान शिव की अराधना करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। इसके बाद गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक भगवान गणेश की विशेष पूजा- अर्चना की जाती है। इसके बाद भगवान श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है।

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