परिक्रमा के स्थापना दिवस पर बही ” काव्य की धारा “| यहां हुयी कवि सम्मेलन| Click कर पढ़िये पूरी खबर

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सिटी लाइव टुडे, मीडिया हाउस

एक सुखद संयोग था कि पंचपुरी की अग्रणी संस्था ‘परिक्रमा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच’ ने अपना पाँचवा स्थापना दिवस वसंत पंचमी के पावन अवसर पर सेक्टर चार में स्थित भेल के सामुदायिक केन्द्र में वासंती कवि गोष्ठी का आयोजन करते मनाया। गोष्ठी में नगर के तमाम जाने-माने रचनाकारों ने अपने-अपने रंगों और विधाओं की रचनाओं से श्रोताओं को खूब सराबोर किया। गोष्ठी में अनेक नवागंतुक कवियों ने भी प्रतिभाग किया और अपनी रचनाओं से श्रोताओं को प्रभावित भी किया।


सुरों की देवी माँ शारदे के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन तथा पुष्पांजलि के उपरांत वयोवृद्ध कवि पं. ज्वाला प्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’ की अध्यक्षता में राजकुमारी की वाणी वंदना के साथ प्रारम्भ हुई गोष्ठी अरुण कुमार पाठक ने ‘सुन ले ये बनफूल पुरा, ये राष्ट्रवाद की है धारा, गाँधीवादी भी सुन लें, है राष्ट्रधर्म हमको प्यारा’ के साथ राष्ट्रप्रेम का आह्वान किया और कवि प्रेम शंकर शर्मा ‘प्रेमी’ ने ‘धन्य सनातन धन्य पुरातन, धन्य अयोध्या नगरी है’ सुना कर अयोध्या में श्रीराम मंदिर की स्थापना पर अपने भाव व्यक्त किये। इस अतिरिक्त लगभग सभी कवियों की रचनाएँ ऋतुराज वसंत अथवा तो श्रृंगार रस से ओतप्रोत ही नज़र आयीं। कवि साधुराम ‘पल्लव’ ने भी अपनी प्रस्तुति से ख़ूब तालियाँ बटोरी।


वरिष्ठ गीतकार व कवि भूदत्त शर्मा ने ‘यह भी कैसा परिवर्तन है, बहका-बहका सा तन मन है’, गोष्ठी का संचालन कर रहे मदन सिंह यादव ने ‘फूलों से धरती का हो गया श्रृंगार, मौसम में छाई बसंत की बहार’, कल्पना कुशवाहा ने ‘जिंदगी को देखा तो, मैं जिंदगी से मिल गई’, राजकुमारी ‘राजेश्वरी’ ने ‘तप्त तन को दे गया कल मेघ पानी, ओढ़ ली चुनार धरा ने आज धानी’ के साथ बासंती बयार का साक्षात्कार कराया। वरिष्ठ गीतकार सुभाष मलिक ने ‘मेरा मन चला गाँव की ओर’ से ग्रामीण परिदृश्य के दर्शन कराये। डा. सुगंध पाण्डेय ने ‘विश्वगुरु यह देश हमारा, प्यारा हिन्दुस्तान है’ से तथा ‘राम कृष्ण की धरती है यह गंगा है इसकी थाती’ के साथ देवेन्द्र मिश्र ने अपनी मातृभूमि को नमन किया।

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‘दीपशिखा’ की अध्यक्षा डा. मीरा भारद्वाज ने श्रीराम भजन की शानदार प्रस्तुति दी, तो कर्मवीर सिंह ने ‘एरी मेरी मैया छोटी सी रजाइया’ के साथ ठंडक का अहसास कराया, दिव्यांश कुमार सिंह ने ‘कभी चलें तो चलते जाना मत रुकना इंसान’ से प्रेरित किया, देहरादून से आये सत्येंद्र बिजल्वाण ने ‘हमने ऐसे किरदारों को मारा है, अब जिनके मर जाने का दुख होता है’ अमित कुमार ‘मीत’ ने ‘आज एक खत फिर कुर्बान हो गया, कल तक गेहूँ से भरा था, आज मकान हो गया’ से मानव की वर्तमान मानसिकता पर तंज कसे और आशा साहनी ने ‘प्रेम का इतना मतलब निकाला करो, तन को मंदिर तो मन को शिवाला करो’ के साथ प्रेम की अध्यात्मिक परिभाषा गढ़ी। गोष्ठी का समापन ज्वाला प्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’ के छंदबद्ध राष्ट्र वंदन ‘बढ़े भारती का मान जैसे देखो आसमान’ के साथ हुआ।

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