Garhwal Khabar @ ” खुद मा ” | डौंर-थकुली की ताल |गले मिलते ही बहा आंसुओं का सैलाब| jaimal Chandra की Report

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सिटी लाइव टुडे, जयमल चंद्रा, द्वारीखाल

citylive today media house दिन दिनों सिटी लाइव टुडे मीडिया हाउस लगातार पहाड़ की पीड़ा व पहाड़ के सरोकारों पर फोकस कर रहा है। Garhwal Khabar वीरांन गावों की दास्तां बयां करती रिपोर्टों को आप पढ़ रहे हैं और सराह रहे हैं। Garhwal Khabar इसके लिये आपका धन्यवाद। इस रिपोर्ट में एक ऐसे गांव की कहानी बयां कर हैं जिसकी कहानी कई और भी गांवों से मेल खाती है।

आंख अभी खुली नहीं कि मेरे सपने गये कहां,
बूढ़ा पवर्त रोता है कि मेरे अपने गये कहां,,

अपने जनपद पौड़ी pauri garhwal के द्वारीखाल ब्लाक का कल्सी गांव की कहानी भी ऐसी ही है। यहां भी साल में चार-दिन के लिये ही प्रसासी आ रहे हैं। खास बात यह है कि डौंर-थकुली की ताल इन प्रवासी को बुला रही है और ये प्रवासी आ भी रहे हैं। कुछ दिनों के लिये रौनक व रंगत दिख रही है। लाचार बुढ़ापे के आंखों में अपनों से मिलने व जीभरके गले मिलने की खुशी के आंसू के भावों में शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। immotion of old person

अब सीधे खबर पर आते हैं। दरअसल, पौड़ी जनपद के द्वारीखाल ब्लाक का कल्सी गांव कभी ग्राम पंचायत हुआ करता था। लेकिन पलायन के चलते आबादी कम होने के चलते अब यह गांव मस्ट ग्राम पंचायत में शामिल हो गया है। migration in garhwal वक्त अभी ज्यादा भी नहीं गुजरा जब कल्सी की आबादी करीब 600 के आसपास थी लेकिन पलायन की मार ने अब यहां हालात सोचनीय बना दिये हैं। अब यहां पर 25 – 30 गिने- चुने वृद्ध दंपति या बूढ़े महिला -पुरुष ही रह गए हैं।


हालातों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्राथमिक विद्यालय कल्सी इस क्षेत्र का सबसे पुराना विद्यालय लगभग 5 साल पहले ही बंद हो चुका।
कहने का मतलब यह है कि सन्नाटा ही पसरा है। वृद्धजन अपनों साथ शहर जाने को तैयार नहीं है। ये यहीं गांव में रहता चाहते हैं और रह भी रहे हैं।
अपने अपनों से मिलने आते तो हैं लेकिन कुछ ही दिनों के लिये। वक्त मिले तो गांव की ओर रूख करते हैं अपने शहरी बाबू लोग।
लेकिन-लेकिन-लेकिन,,,, पिछले कुछ सालों से धार्मिक अनुष्ठानों मंे शामिल होने का क्रेज प्रवासी मेें बढ़ रहा है। इस बात से आप भी सहमत होंगे। आपके गांव में भी ऐसा ही हो रहा है।


कल्सी गांव में भी ऐसा ही हो रहा है। साल में एक बार हो रहे धार्मिक अनुष्ठान मंे यहां भी प्रवासी खूब आ रहे हैं। डौंर-थकुली बुला रही है और अपने बुजुर्गाे से मिलने की चाहत पूरी हो रही है। दादा-दादी, मां-बांप अपनों को जीभरके गले लगा रहे हैं।
इस बार भी 4 जून से 8 जून तक तक अपने कुल देवता की पूजा के धार्मिक अनुष्ठान मे सभी प्रवासी अपने परिवार के साथ गांव मे पहुंचे। 5 दिन चले इस कार्यक्रम ने भले ही कुछ दिनों के लिए ही सही पर पुनः वही रौनक वापस लौटा दी।

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रैवासियों व प्रवासियों के मिलन ने पुराने दिनों की यादें ताजी की। वृद्ध महिला पुरूष इन पांच दिनों की खूबसूरत यादों को अपने दिलों में संजो रखा है। यादें इधर भी हैं और उधर भी। विदाई का भावुक क्षण बेहद ही खास रहा। आंसुओं का सैलाब बह रहा था इनकी आंखों में भी और उनकी आंखों में भी।

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