सुधा सती | थम गयी जन-आंदोलन की ” ज्वाला “| जन-आंदोलन के एक युग का अवसान|पुष्पेंद्र राणा की रिपोर्ट

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सिटी लाइव टुडे, पुष्पेंद्र राणा, पौड़ी गढ़वाल

कभी संघ,भाजपा और दुर्गा वाहिनी की सशक्त स्तंभ रही, रामजन्मभूमि मन्दिर आन्दोलन और पृथक उत्तराखंड आन्दोलन की अनन्य हस्ताक्षर सुधा सती अब हमारे बीच नहीं रहीं। पांच वर्ष पहले एक दुर्घटना में उनके पांव में फ्रैक्चर आने पर वह सात आठ महीने घर से बाहर जाने में असमर्थ सी हो गई थीं। शारीरिक गतिविधियां थमने से उन्हें अन्य दिक्कतें होनी लगी। ब लेकिन उन्होने अनमने मन से ही सही सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की हर संभव कोशिश की। लेकीन लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व उनके पेट में एक बहुत बड़ा ट्यूमर डायग्नोस होने पर उनका उसी तरह उपचार दिल्ली एम्स में प्रारंभ किया गया। वे बीच में स्वस्थ भी हुईं लेकिन दो मास पूर्व फिर से अचानक अस्वस्थ होने लगी और 4 जुलाई को दिल्ली में उन्होंने हम सबसे विदाई लेकर अपना महाप्रस्थान कर दिया।


स्वर्गीय सुधा सती ने पूरे चार दशकों तक अनवरत निस्वार्थ सामाजिक जीवन जी कर सचमुच अपना जीवन सार्थक किया। चूंकि स्वयं उनके पति स्व ईश्वर दत्त सती (शास्त्रीजी) अमृतसर में बाल्यकाल से ही संघ के संपर्क में आने से बाद में विभिन्न आंदोलनों में 13 बार जेलयात्राएं कर चुके थे। जिनमें महा पंजाब आन्दोलन, आपातकाल, रामजनभूमि, उत्तराखंड आन्दोलन की जेल यात्राएं भी थी। विवाह के बाद ही अमृतसर अपने पति की डेढ़ आपातकाल की जेल यात्रा के अनुभव के बाद यह राष्ट्रकार्य की अनथक यात्रा पूरे चार दशक तक अनवरत पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ चलती रही और यह सेवा दीप अपने प्रकाश से समाज में संकीर्णता के अंधेरे को चीरता रहा।


न जाने कितने आमरण अनशन, छोटे छोटे अनशन, कितने आन्दोलन उनके नेतृत्व के साक्षी हैं। वे राम जन्मभूमि आन्दोलन में दुर्गा वाहिनी की नेता के नाते अयोध्या नरसंहार और फिर विवादित ढांचे ध्वंस के समय अपने पति स्वर्गीय ईश्वरी दत्त सती (शास्त्री) के साथ साक्षी थीं। 1989 में वह जनपद पौड़ी भाजपा महिला मोर्चा की महामंत्री और अध्यक्षा थी। लेकिन रामजन्मभूमि आंदोलन के समय उन्हें दुर्गा वाहिनी का दायित्व दिया गया। उसके बाद उन्होंने पूरे एक दशक तक दुर्गा वाहिनी को गढ़वाल में विभिन्न आंदोलनों का पर्याय बनाकर रख दिया था।

उस आन्दोलन में उनपर कई धाराएं लगी उन्हे भूमिगत रहकर आन्दोलन चलाना पड़ा। इसी आन्दोलन से उन्होंने कोटद्वार में महिलाओं की ऐसी टोली खड़ी की जो पूरे उत्तर प्रदेश में सभी के लिए प्रेरणा की स्रोत बन गई। उनकी टीम ने कोटद्वार में घर घर में अखंड रामायणों के पाठों का एक व्यापक अभियान चला कर लोगों में जागृति पैदा की। उन्होंने अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध से ही कोटद्वार में कीर्तन मंडलियो की शुरुआत करके कीर्तन मंडलियों की बहुत बड़ी श्रृंखला खड़ी की। विहिप के उत्तरदायित्व के नाते उनके पति शास्त्री जी द्वारा कोटद्वार में कई वर्षों तक स्वयं की व्यवस्था पर भागवत कराए जिसके लिए वे काशी से भागवताचार्य बुलाते थे जिसकी पूरी व्यवस्था सुधा सती देखती थीं। प्रारम्भ में यह आयोजन मानपुर में होते थे और बाद में मुख्य बाजार में होने लगा।


इन्हीं दिनों सुधा सती ने तत्कालीन उत्तर प्रदेशमें प्रदेश के परिवारों को लील रही , आत्महत्याओं का कारण बन चुकी,नम्बर एक की लाटरी के विरुद्ध भयंकर आन्दोलन की शुरुआत कोटद्वार से की । जिसमे उनपर कई मुकदमें दर्ज हुए। लेकिन अंत में केवल कोटद्वार में उनके द्वारा चलाए जबरदस्त आंदोलन ने पूरे उत्तर प्रदेश में नंबर वन की लॉटरी को बंद करवा दिया। इसी समय जब तत्कालीन उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार आई तो सुधा सती जी ने अपने पति स्व ईश्वर दत्त सती (शास्त्रीजी) के साथ पूरे कोटद्वार भाबर में भूमि के विनिमियतिकरण के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया और अपने ही संसाधनों पर दिल्ली फिरोज शाह कोटला में कोटद्वार से कई बसें ले जाकर वहां अपनी बात रखी। और तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जी से तीव्र आग्रह कर कोटद्वार की स्टांप की भूमि को रजिस्ट्रीकृत भूमि में परिवर्तित करवाया।
उत्तराखण्ड आन्दोलन में तो वे कोटद्वार में उस आन्दोलन की सीधी धुरी ही थीं। उनकी दुर्गा वाहिनी महिलाओ की टीम ने उस आन्दोलन को अपनी कर्मठता से स्वयं में ही समेट लिया। यूं तो आन्दोलन की कई धाराएं थी लेकिन सुधा सती जी के नेतृत्व में कोटद्वार की महिलाओ ने उस आन्दोलन को एक अलग ही ऊंचाई दे दी। उन्होंने सर्वप्रथम कोटद्वार के स्थानीय मालवीय उद्यान में दिसंबर और जनवरी की कंपकंपाती ठंड में लगातार 93 दिनों का महिलाओं के साथ धरना किया, जिसमें कोटद्वार के हर मोहल्ले के महिलाओं का प्रतिभाग कराया गया। जिस अनशन को उन्होंने जनरल खंडूड़ी जी द्वारा लखनऊ रैली में चलने के व्यक्तिगत आह्वान के चलते उठाया।उनके नेतृत्व में आंदोलन की तीव्रता से बौखला कर उस समय के एसओ ने थाने के आगे उनके द्वारा महिलाओं के जुलूस का नेतृत्व करने पर उनके सिर पर स्टेन गन तक तान दी थी। उन्हे पूरे आंदोलन में कई बार भूमिगत रह कर काम करना पड़ा।

उन पर इस आंदोलन में जितने मुकदमें दर्ज हुए उतने उत्तराखंड में चुनिंदा लोगो पर दर्ज हुए होगें। जब वे दिल्ली रैली से लौटे तो मुजफ्फरनगर कांड के बाद सारे उत्तराखंड में कर्फ्यू से सन्नाटा पसरा था। तब उन्होंने सर्वप्रथम कोटद्वार के देवी रोड से सैकड़ों महिलाओं को लेकर कर्फ्यू का उल्लंघन कर सारे उत्तराखंड में पसरे सन्नाटे और भय के वातावरण को चीर दिया। जिसके बाद सारे उत्तराखंड में कर्फ्यू का उल्लंघन हुआ और आन्दोलन ने पुनः जोर पकड़ा। उस समय कोटद्वार में आंदोलन का सबसे हॉट स्पॉट उनका मोहल्ला मानपुर हुआ करता था। जो मानपुर कभी अपराध के लिए दूर दूर तक कुख्यात था वह अच्छी गतिविधियों के लिए चर्चित रहने लगा।

मानपुर यानि कई तरह के जातीय समीकरण के बावजूद पार्टी चुनाव में भाजपा का गढ़। उस समय आंदोलन में महिलाएं मतलब अधिकांश मानपुर, सिताबपुर, शिवपुर, बालसौड़ और पदमपुर की महिलाएं। सालों तक राजनीति के मछवारे निष्ठावान कार्यकर्ताओ की तलाश में उसी मानपुर में जाल फेंकते रहे। जब सुधा सती गढ़वाल मद्य निषेध समिति की संयोजिका थी तो उन्होनें दायित्व सम्हालते ही कोटद्वार शहर से शराब की दुकानों को शहर से बाहर निकालने के लिए बहुत बड़ा आन्दोलन चलाया और अंततः उस समय सालों तक शराब की दुकानों को शहर से बाहर सरकार को शिफ्ट करना पड़ा। इस आंदोलन में भी उन पर कई मुकदमें दर्ज हुए। उनके नेतृत्व चले इस लंबे शराब विरोधी आंदोलन की सफलता से पूरे गढ़वाल में पुनः शराब विरोधी आंदोलनों की बाढ़ सी आ गईं।

जब उन्हें 1996 में आरएसएस की सेवा भारती का दायित्व दिया गया तो उन्होनें कोटद्वार की दलित बस्तियों में सेवा बस्तियां स्थापित करके स्वयं प्रतिदिन समय देकर कल्याण केन्द्र चलाए।इन कल्याण केंद्रों में जून तक की दोपहरियों में वे स्वयं महिलाओं को सिलाई, खाद्य प्रशिक्षण जेसी विधाओं में प्रशिक्षित करने जाती थीं। और कोटद्वार में सेवा भारती की बहुत अच्छी टीम उन्होने तैयार की थी। उनकी सक्रियता का अनुमान केवल इस बात से लगाया जा सकता है। उनका सेविका समिति की गतिविधियों में तो सक्रियता थी ही लेकिन आरएसएस के गुरु दक्षिणाओं में बौद्धिकों में बौद्धिक करने के लिए प्रवास करने वाली वह एकमात्र महिला रही होंगी। उन्होंने कुछ समय संघ के उत्तराखंड के प्रथम मातृमंडल प्रमुख का दायित्व भी सम्हाला।कई कार्यकर्ताओ और पूर्ण कालिकों के लिए वह मातृवत थीं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की वह सदैव संरक्षक के रुप में रहीं और लगातार छात्राओं के साथ प्रवास करती रहीं।


श्रीमती (स्व) सुधा सती ने इनसे भी बहुत बड़ी उपलब्धि स्थानीय जनता के व्यक्तिगत कार्य निपटाने में रही। उनके पास कभी भी कोई सहायता के लिए आया तो उसने न नहीं सुनी और जब उन्होंने किसी की सहायता की तो वे फिर भी सीमा तक गई। यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी।इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय लोगों की समस्याओं के लिए वे कई बार अनशनों में बैठी और लोगों की समस्याओं के लिए आमरण अनशन तक पर बैठी।

लोगों पारिवारिक मसले, भूमियों के विवाद, उन दिनों बहुत विकट चल रहें दहेज के प्रकरण के अनेकों मामले उनके द्वारा सुझाए गए। यह स्थिति तक थी की कोटद्वार में ऐसा प्रकरण हुआ हो और एक पीड़ित पक्ष सुधा सती के पास न पहुंचा ऐसा ही नहीं हुआ। शहर में किसी भी लाचार को यह आशा रहती थी कि दूसरी ओर कैसी भी ताकत हो सुधा सती उसकी सहायता के लिए अवश्य आएंगी और उसे राहत दिलाएंगी। ऐसे न जानें कितने किस्से हैं।
अलग अलग प्रकृति के कई तरह के आंदोलन उन्होंने किए। 1992 में बीएड के बेरोजगारों के लिए उनका सफलता दिलाने वाला संघर्ष हो। निकाल दिए वन निगम कर्मचारियों को पुनः बहाल कराने का मसला हो, गढ़वाल मंडल गैस कार्मिकों का मसला हो , विभिन्न विभागीय कार्मिकों के मसले हों या कोटद्वार में फैक्ट्रियों में मजदूरों की समस्या हो उन्होंने ऐसी अनेकों समस्याओं को भी अपनी सफल परिणति तक पहुंचाया। उनका और भी बड़ा महत्वपूर्ण योगदान गढ़वाल में ह्यूमैन ट्रैफिकिंग के विरुद्ध पूरे दो दशकों का संघर्ष रहा। लव जिहाद के रूप में चल रही ह्यूमन ट्रैफिकिंग की गंभीरता को उन्होंने बहुत भांप लिया था और लगातार प्रयासों से वे एक ऐसा दौर ले आए थे कि आने वाले पूरे एक दशक तक कोटद्वार क्षेत्र में इस तरह का चलने वाली ह्यूमन ट्रैफिकिंग पूरी तरह थम गई थी।

उस समय के वातावरण में जब इन विषयों पर जागृति का घोर अभाव था तब भी उन्होंने ह्यूमन ट्रेफिकिंग के अनेकों पीड़ितों का सफलता पूर्वक रेस्क्यू किया और उनका पुनर्वास करवाया। वे जब तक स्वस्थ रही प्रतिदिन पूरी संवेदना के साथ जनता की सेवा में लगी रहीं। और जिस प्रमाणिकता के साथ उन्होंने यह किया वह तो बेमिसाल है। वे 1991से लगातार जनरल खंडूड़ी की सांसद प्रतिनिधि रहीं।

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वे जिला पंचायत सदस्य भी रही और उन्होंने पूरी निष्ठा से जनता की सेवा की।उन्होंने अपना प्रतिभाशाली परिवार देश सेवा में झोंक दिया बिना परिणाम की परवाह किए हुए। उन दुर्लभ मूल्यों और परम्पराओं को निभाने के लिए, जो उन्हे विरासत में मिली थी कभी उन्हे आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अपने और अपने सारे परिवार के हितों को दांव पर लगा दिया। उन्होंने सामाजिक और आध्यात्मिक समझ से जनता की सेवा की राजनैतिक समझ से नहीं। यही कारण है कि इतना विराट व्यक्तित्व होने पर और राजनैतिक गतिविधियों का अटूट हिस्सा होने पर वे भी राजनैतिक रूप से उस पायदान पर नहीं रहीं जिसकी वह सच्ची अधिकारी थीं। केवल जानने वाले ही समझ सकते हैं कि वे आज की भाजपा की बुनियाद की उन अव्वल ईंटों में से थी जिनपर आज यह भव्य कंगूरा खड़ा है….

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