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वैलेंटाइन तक झूम लो, फिर लौटेगी वही अंधेरी रात|अजय रावत, वरिष्ठ पत्रकार

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सिटी लाइव टुडे, अजय रावत, वरिष्ठ पत्रकार

उत्तराखंड गठन के बाद मरघट से सन्नाटे से लिपटे रहने का दंश झेल रहे पहाड़ के गांव चौबारों में इन दिनों हर पांच बरस में आने वाली रंगत छा रखी है। जिन पहाड़ियों को देहरादून हल्द्वानी में “पहाड़ से आये हैं” के संबोधन सेन नवाजा जाता है उनके चरणों में अनुनय विनय के स्वांग रचे जा रहे हैं।


हम पहाड़ियों के वोट की बदौलत देहरादून के आलीशान प्रासादों में पंच सितारा जीवन यापन करने वाले नेता पत्नी-पुत्र-पुत्री, जो पहाड़ और गांव शब्द के प्रति ही हिक़ारत की नज़र रखते हैं, वो इन दिनों आपसे नाते और रिश्तेदारी तक का संबोधन कर रहे हैं।
अब बस महज़ चार-छह दिन शेष हैं, इस स्वांग के। उनके लिए यह स्वांग रचना बहुत कष्टकारी होता है लेकिन आने वाले पांच साल के लिए एक विस्मयकारी लाभ वाला इंवेस्टिमेन्ट भी। ऐसा निवेश जो पांच बरस में इतनी बरक़त पा जाता है कि आने वाली पांच पुश्तों के ऐश्वर्यपूर्ण जीवन का जरिया बन जाता है।

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14 फरबरी बीतने के बाद ये सभी नट नटियाँ अपने आलीशान महलों में लौट जाएंगे, पहाड़ फिर वीरान-बियावान हो जाएंगे, हम पहाड़ियों के काम खत्म हो जाएगा। कुल मिलाकर “सब्बि धाणी देरादून” हो जाएगा। उनके महल्ले की सड़क पर नई टाइल्स लग जायेगी, बड़ी हैलोजन सजेगी, नया फब्बारा बनेगा, आलीशान पार्क और जिम खुलेगा। हां, कुछ छींटें तुम्हारी ज़ानिब भी तो रुख करेंगे, जिनसे तुम पुरानी सीसी रास्ते के ऊपर नई रेत डालोगे, पुराना पुस्ता खोल नया बनाओगे, मनरेगा जॉब कार्ड में अर्ज़ी फ़र्ज़ी दिन चढ़वा के खुशी से झूम उठोगे।

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