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टीर| पलायन की मार झेलता ये खास गांव| साभार- मनमोहन सिंह

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सिटी लाइव टुडेसाभार-मनमोहन सिंह


पलायन ने पहाड़ की मनमोहक फिजां पर ग्रहण सा लगा दिया है। अकूत प्राकृतिक संपदा होने के बाजवूद गांव रंगत खोते होते जा रहे हैं और इससे हर कोई हैरान है। मूलभूत सुविधाओं के अभाव ने पहाड़ के गांवों को खाली कर दिया है। एक ऐसा ही गांव है टीर। यह गांव पलायन की मार झेल रहा है।

जनपद पौड़ी के असवालस्यूं पट्टी का गांव टीर अपने आप मंे बेहद खास है। वक्त ज्यादा नहीं गुजरा जब टीर गांव पशु-पालन व खेतीबाड़ी में अपनी विशिष्ट पहचान रखता था। सांस्कृतिक धरोहर को समाये टीर गांव को कुदरत ने खूबसूरती भी दिल खोलकर बख्शी है। चैतरफा पहाड़ियों के बीच तलहटी पर बसा टीर गांव में सिंचाई के प्रचुर संसाधन मौजूद हैं। सो, खेतीबाड़ी भी प्रचुर मात्रा में होती थी। गांव की और खास पहचान यहां का बरगद को पेड़ है। यह बरगद के पेड़ की रस्सियों से झूला झूलने आसपास के गांवों के लोग आज भी आते हैं।
पहले इस गांव में सड़क व पर्याप्त पेयजल सुविधा नहीं थी लेकिन वर्तमान में गांव तक पहुंचने के लिये सड़क भी है और पानी की समुचित व्यवस्था भी।

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टीर गांव भी पलायन की मार से अछूूता नहीं रह पाया। यहां के लोगों ने पलायन करना शुरू कर दिया और आलम यह है कि वर्तमान समय में इस गांव में एक दर्जन परिवार भी नहीं हैं। कभी इस गांव में डेढ़ सौ परिवार रहा करते थे। ऐसे में टीर गांव पर पड़ी पलायन की मार का अंदाजा आप खुद ही लगा लीजियेगा। लोगों ने शहरों में पलायन कर लिया है। कुछेक ऐसे भी हैं जिन्होंने शहरों की ओर पलायन नहीं किया लेकिन उन्होेंने यह गांव छोड़ दिया है। कुछ लोग भेटी बाजार में शिफ्ट हो गये हैं। टीर गांव के मनमोहन सिंह, सोबन सिंह, रविंद्र रावत बताते हैं कि गांव के प्रति सभी का लगाव व प्रेम है लेकिन गांव पलायन की मार झेल रहा है। गांव में पहले जैसी रंगत व रौनक नहीं रही। पूर्व प्रधान नरेद्र बिष्ट कहते हैं कि विवाह समारोहों व अन्य अवसरों पर लोग गांव आते हैं तब गांव अपनी पुरानी रंगत में दिखता है।

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