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प्रताप शिखर|हेंवल से निकला साहित्य, संस्कृति, जनसेवा का एक भगीरथ| साभार-वरिष्ठ साहित्यकार नरेंद्र कठैत

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सिटी लाइव टुडे, साभार-वरिष्ठ साहित्यकार नरेंद्र कठैत

खाड़ी! इस शब्द का उल्लेख होते ही बुद्धि सीधे बंगाल की खाड़ी दौड़ जाती है। किंतु क्षमा करें यह खाड़ी वह खाड़ी नहीं है। यह खाड़ी उत्तराखण्ड के टिहरी जनपद में ऋषिकेश गंगोत्री राष्ट्रीय मार्ग पर हेंवल नदी की वह थाती है -जिसे आदि गुरू शंकराचार्य, स्वामी रामतीर्थ, गुणानन्द पथिक, जीवानन्द श्रीयाल, मोहन लाल नेगी, घनश्याम रतूड़ी ‘सैलानी’, विद्यासागर नौटियाल, श्यामचन्द्र सिंह नेगी, सुन्दर लाल बहुगुणा, आचार्य गोपेश्वर कोठियाल, धूम सिंह नेगी, विजय जड़धारी, आलोक प्रभाकर, कुंवर प्रसून यहां तक गोरखनाथ मठ के तपोनिष्ठ योगी आदित्य नाथ ने भी अपनी किशोरावस्था में कई बार नापी है। इसी भाव भूमि से जुड़े हेंवल से निकले साहित्य, संस्कृति, जनसेवा के भगीरथ का नाम है- प्रताप शिखर!

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22 मार्च 1952 को कुंजणी पट्टी, टिहरी गढ़वाल के कोटी गांव में जन्मे – प्रताप शिखर सत्तर के दशक से कई जनांदोलनों की धूल मिट्टी में सने। जेल गये। इन जनांदोलनों में 1970-71 मद्य निषेध आंदोलन, चिपको आंदोलन, 1974 की अस्कोट-आराकोट पैदल यात्रा तथा उत्तर प्रदेश छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के तहत 5 जून से 30 जून 1978 तक दोहरी शिक्षा पद्धति के विरूद्ध लखनऊ के कान्वेंट तालुकेदार पब्लिक स्कूल से देहरादून के दून पब्लिक स्कूल तक की पदयात्रा तथा ‘बीज बचाओ अभियान’ प्रमुख हैं।

जन सरोकारों के समाधान के लिए ही आपने 1983 में खाड़ी में ही ‘उत्तराखण्ड जन जागृति संस्थान’ की नींव रखी। कह सकते हैं एम.ए. एल.टी उच्च शिक्षित व्यक्ति ने समाज सेवा की ओर अपने समग्र जीवन की राह ही मोड़ दी। आपने एक स्थान पर लिखा भी है कि- ‘सन् 1974 के बाद चिपको आंदोलन में कूदा तो वन और वनवासीं के अलावा कुछ देखा ही नहीं।’

भले ही प्रताप शिखर स्वंय अपने व्यक्तित्व को विस्तार देने से संकोच करें, लेकिन प्रताप शिखर नाम का परिचय इतना भर ही नहीं है। आप उच्च कोटी के हिन्दी तथा गढ़वाली के साहित्यकार भी रहे हैं। साप्ताहिक हिंदुस्तान, हिलांस, अलकनंदा, नई आजादी, उजाला, अमर उजाला, सीमांत प्रहरी, नवभारत टाइम्स तथा युगवाणी आदि पत्र पत्रिकाओं में छपे आपके आलेख आपके दमदार लेखन के गवाह हैं। आपके लेखन में समाज के सभी रंग है। एक स्थान पर लिखते भी है कि ‘सामाजिक काम करते हुए जो मन में आया वह लिख डाला। मैं नहीं जानता कि यह मेरे मन की पीड़ा है या सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मेरा आक्रोश।’
यही कारण है कि तमाम द्वंदों में भी आप न कभी रूके न थके। तथा जन सरोकारों में भागीदारी के साथ निर्भीक कलम भी चलाते रहे। फलस्वरूप तमाम आलेखों के साथ-साथ विभिन्न काल खण्डों में आपकी चार पुस्तकें प्रकाश में आई हैं। ये सभी पुस्तकें पठनीय ही नहीं अपितु महत्वपूर्ण एंव शोध संदर्भित हैं।

सन् 1989 में प्रकाशित गढ़वाली भाषा में ‘कुरेड़ी फटेगी ’ आपका कहानी संग्रह है। इस कहानी संग्रह के प्रथम पृष्ठ पर कुछ महत्वपूर्ण जानकारी यूं मिलती हैं- प्रकाशक उत्तराखण्ड जन जागृति संस्थान, खाड़ी जाजल, टिहरी गढ़वाल। प्रथम संस्करण-1989। सहयोग राशि- 5 रूपये। मुद्रक: युगवाणी प्रेस, देहरादून।

लेकिन एक जानकारी विशेष संन्दर्भित है। लिखा है- आर्थिक सहयोगः उत्तराखण्ड सेवा निधि, अल्मोड़ा। गढ़वाल और कुंमाऊ दो अलग-अलग संभागों, दो भाषाओं में सहयोग का यह युगान्तकारी प्रयोग दुबारा धरातल पर नहीं उतरा। प्रताप जी ने एक स्थान पर लिखा भी है-‘ म्यरि कहानी नि छपि सकदी थये, अगर उत्तराखण्ड सेवा निधि का सचिव डाॅक्टर ललिता पाण्डे म्यरी मदद नि करदा । डाॅ पाण्डे न मैं तैं किताब छपौण का खातिर रुप्या दिन्येन। यांका वास्ता मैं डाॅक्टर पाण्डे कौंकू आभारी छौ।’ यह मात्र कहानी संग्रह ही नहीं अपितु उत्कृष्ट सहज, सरल गढ़वाली प्रतिनिधि गद्य रचना भी है।

कहानी संग्रह के शुरूआत में ही आपने अपनी प्रतिबद्धता कुछ यूं व्यक्त की है- ‘रोमांस कर्नू अर अपड़ा पात्रू सि रोमांस करोणू म्यरी वृत्ति नि छ। म्यरी कहानी का पात्र समस्यों सि ग्रस्त छन। ऊं बिचारौं तैं रोमांस कर्न कि फुरसत नि छः। म्यरा पात्र त दुःख-दर्द, कष्ट अर तरास भुगतण वाला छन। मनोरंजन हंसी – खुशी अर सुखी जीवन अजैं ऊंसी कोसों दूर छ।’ यही कारण है कि उनकी कहानियों में वर्णित पात्र कपोल कल्पित नहीं हैं बल्कि उनके आस-पास के जीवंत चरित्र है। ये वे चरित्र हैं जिनके साथ वे कलम से नहीं बल्कि पसीने से जुड़े रहे। ‘पुस्सू मिस्त्री’ कहानी के संदर्भ में आपने लिखा भी है कि-‘ पुस्सू मिस्त्री कहानी को प्रमुख पात्र छ। पुस्सू मिस्त्री वास्तव मा मिस्त्री छ। वे मिस्त्री न म्यरो कूड़ू चिणे अर मैंन स्वयं ढुंगु-माटु देण को काम करे।’ चरित्र के साथ स्वयं धूल मिट्टी में सनकर ग्रामीण भवन निर्माण की कारीगरी को समझा और धरातलीय लिखा कि ‘कूड़ा की चैकोरी घुमौन्दी बग्त वैन चारी कोणौं पर गुण्यां लगाई अर कोकड़्यां ह्वैक सूत पर मिलायी। जब तक गुण्या फिट नि बैठि तब तक पुस्सू कभि ये कोणा अर कभि वे कोणा रई फिरोड़ेन लग्यूं। कभि भ्वां मा बांगू ह्वैक सूत कि सिधैस देखू। जब गुण्या सही बैठगे तब वैन बीड़ी सुलगाई अर किनरा पर बैठीक सुस्ताण ल्हैगे। पुस्सून गैल का मजदूर मा बोली- ‘बोला साब ठीक छ। सुद्धि थोड़ी बोली कैन- ब्यौ कि कांग अर कुड़ा कि बांग कभि नि जांदी बल।’

इसी कहानी में नये पुराने जमाने के गठजोड़ पर वार्तालाप का एक अंश भी ध्यान खींचता है- ‘जमनू गुसैं पुराणा जमाना कु मनखी छ बिचारु। वैन बोलि- ‘हरे, भैर देखणक दिवाली पर याक छोटि सि मोरी बणै दे अर चिजी-बस्ती धरनक भितर कि दिवाली पर यक खादरू बणे दे।’

  • ‘खदरा-खुदरा अर मोरी -मारी पैलि का जमाना मजि होन्दी थै। अब तुम देखदि जा कि क्या चिणेन्दे।’- पूस्सुन बोली। ‘चन्दैण’ कहानी कृपाली के इर्द गिर्द है। लिखा है कि- ‘कृपाली वे जमाना को अपर पास छ। वैका इम्तियान टीरी का चणा खेत मजि रज्जा न स्चयं लिनि छया। वैका बैच का नौन्याल पटवारी बणेन। पटवारी त रज्जा न कृपाली भी बणायी छयो पर वैका बाबू न वै सणि घर हि रोकि दिने। बाबू न बोली ‘हमारो अपड़ हि झोलू तोमड़ बथेरु छ।’

लेकिन समय का चक्र कुछ इस तरह से घूमता है कि कृपाली कुरीतियों और आडम्बरों से घिर जाता है। ये पंक्तियां उसी कटाक्ष की हिस्सा हैं – ‘कृपाली को होक्का-पाणी बन्द होये। पैणू भी वै सणि नि दिये जान्दू, होक्का-पाणी, खंडण-मंडण, जिम्मण-जुठ्ठण, मर्न-बर्न, दार-सांग, ब्ये-पगीन अर बार-त्योहारु सब पंचैती कामू सि ऊ अलग करे गये। यख तक कि बांट-फांट सि भि वैको नौ कटिगे। यूं फोन्दयों को बस चलदो त वोटर लिस्ट भिटि भि वैको नौ मैणमेट करिदेन्दा।’

कुरीतियों के भंवर में घिरे भंवर से बाहर आखिर कोई निकले तो कैसे निकले। बंद हुक्का पानी शुरू करने के आडम्बर का विधान देखिए। चन्द्रैण में लिखा है-‘पंडत जी न कृपाली अपड़ा सामणी बैठाले अर वै मा बोले-‘ जजमान जी, तुम तैं सुजन्या करोण को भारी खर्च करनो पड़लो। सात बामण सात दिन तैं लगातार तुमारा डेरा पूजन करला। सात गायों का सात सेर गौंत सात दिन तैं पेण पड़लो । सात गायों तैं सात रोज तक सात-सात पथा साबूत ग्यौं खलोण पड़ला। ऊंका मोल सी साबूत ग्यौं खोजीक ऊं ग्यौं कि रोज सात रोटी बणैक सात रोज तक यकुला खाण पड़लो। सात दिन तैं सुबेर-सुबेर को सात सोतू का पाणी को स्नान करनो पड़लो अर यकुला को बर्त रखण पड़लो । सात बामणू तैं सात धोती अर सात गायों का दान करीक सात सौ सात रुप्या गुरुदक्षिणा देण पड़ला। सात बालिश्त लम्बी अर सात बालिश्त चैड़ी बेदी को निर्माण होलू। बेदी का खातिर भि पर्याप्त सामाग्री चैन्दी। सात गौं का लोग सात सात दिन तैं जिमौण पड़ला अर सात सौ कन्याओं तैं दक्षिणा देण पड़ले। सोनू हमारा शास्त्र मा परम पवित्र पदार्थ माने गये। ये वास्ता सात तोला सोना की सात मूरती बणैक सात बामणू तैं दान कर्न पड़ली।’

इसी संग्रह की ‘सौ गोती अर एक धोती’ कहानी में नवजात शिशु के जन्म समय की सटिक गणना के लिए रूपरेखा कुछ यूं बनती है – ‘ओबरा कि देलि़ भिटि भितर जुलमुंडी मारीक मुखत्यार गैणासिंह न पुछे-‘अजैं नि होये।’ भितर जनानौं का बीच बैंठी एक बुढ़ड़ी न बोले- ‘अजैं कुछ बग्त लगलू।’ उकील कौंका डेरा भिटि घड़ी मगैक डिंड्याल़ मा धरीं छ अर वख मजि सही टाइम देखण्क मंगितू बैठाल्यूं छ। मुखत्यार न वै समझाए- जनि ऊ बन्दूक कि फायर सुणलू घड़ी पर सही समय घण्टा मिनट अर सेकेण्ड नोट करि ल्यौ। सही समय मालूम करक जनम पत्री भि सही बण्दी।’

तवा ताता घुग्गू माता ।- नीम निमाणा धरम ठिकाणा पर रयूं चैंन्दू।- मौण कौंकी बल एकै भौण । -पराया धन च फल दम मुस्सा बल बैंगण चुस्सा। -घरफंड का कपड़ा फंड।- ब्यो मांगणू बल कुल सोधीक अर कूड़ू चिण्नू बल नींव सोधीक। कहानियों में ऐसे ही अनगिनत मुहावरे अपने स्वाभाविक प्रवाह में हैं।

कुछेक वाक्य विन्यास बरबस ध्यान खींचते हैं। जैसे कि- खांदा मति त्वैक दूध कु गिलास धर्यूं। बिरालू न करू टलक टोटकू! ज दौड़ीक पियौ। -डाक्टर जब भि मरीज तैं देखदू, रग्गा एक ही सवाल पुछदू- ‘मरिगे कि अभी नि मरे।’- हबे यनु अनेउ न कर ।- अब लोक पचास वर्ष का अधखड़ा मुखत्यार का पिछड़ी पड़ि ग्यन। -लम्बा क तैं घुंग्यासू अर ताता क तैं छज्यासू बण्यूं रन्दू।- हंसराज का साटी अर छेमी की दाल़ हमारा सैरौं ही पैदा होन्दी।- पहाड़ मजि त वी मन्खी रई सकदू जैकी बज्जर कि हड्डि लुआ कि टांग अर बकलि़ जिकुड़ि होली।

‘कुरेड़ी फटेगी’ पढ़कर साफ जाहिर होता है कि प्रताप शिखर जी ने उपभाषा में नहीं बल्कि आम गढ़वाली भाषा में सृजन किया है। इसीलिए अग्रज शेखर पाठक भी आपकी सहज और आत्मीय गढ़वाली के कायल हुए। एक स्थान पर शेखर लिखते हैं- ‘एक बार आकाशवाणी लखनऊ या नजीबाबाद से उसकी गढ़वाली कहानी सुनी तो मैं कहानी की मार्मिकता और गढ़वाली भाषा की प्रवाहमयता का कायल हो गया।’ वहीं ‘मिट्टी पानी और बयार’ पुस्तक में धूम सिंह नेगी ने ‘साहित्यिक अभिरूचि सम्पन्न सामाजिक कार्यकर्ता प्रताप शिखर’ में लिखते हैं- ‘जितनी अच्छी तरह से हिन्दी भाषा में लिखते थे उतनी ही कुशलता उन्हें गढ़वाली भाषा में लिखने में प्राप्त थी।’

‘उगते सूरज की तिरछी किरणें’ !
डाॅ. सृजना राणा के संपादन में आपकी 20 हिंदी कहानी की पुस्तक है। ‘उगते सूरज की तिरछी किरणें’ आलेख की शुरूआती पंक्तियों पर दृष्टि ठिटक जाती है। लिखा है- ‘सूर्य को उगने के लिए परिश्रम करना पड़ता है। क्योंकि सामने एक ऊंचा पहाड़ है और बादलों की एक मोटी परत है। प्रतिदिन उसे पहाड़ लांघना पड़ता है और बादलों की परत चीरनी पड़ती है। पहाड़ की चोटी से सूर्य की एक किरण तिरछी होकर मेरे मकान की छत पर पड़ती है और सारे आंगन में बिखर जाती है।’ पहाड़ से उन्होंने ऐसे एक नहीं बल्कि अनेकों बिम्ब खींचे हैं ।

2009 में हिमालय ट्रस्ट, देहरादून के सौजन्य से प्रकाशित कृति का नाम है- ‘कथा सरोवर’!

यह गढ़वाली लोक कथाओं पर आधारित संकलन है। ‘हिमालय ट्रस्ट’ ने संकलन की सभी लोक कथाओं को ‘प्रदीप सामुदायिक रेडियो कार्यक्रम’ के अन्तर्गत पुस्तक के साथ नत्थी सी.डी. में भी रिकार्डेड किया है। इस योजना के अन्तर्गत ट्रस्ट द्वारा गढ़वाल तथा कुमाऊं क्षेत्रों की लोक कथाओं को इस आशय से रिकार्ड किया गया कि परंपरागत मौखिक धरोहर को भविष्य की पीढ़ीयों के लिए संरक्षित रखा जा सके।

‘एक थी टिहरी’!
प्रताप शिखर एंव डाॅ. सृजना राणा द्वारा 2010 में संपादित इस पुस्तक में अधिकांश शिखर जी के टिहरी से सन्दर्भित विभिन्न आलेख हैं। यथा – डुबे हुए शहर मेें तैरते हुए लोग, बाल सखा कुंवर प्रसून और मैं, टिहरी बांध के विस्थापित ,टिहरी -शूल से व्यथित थे भवानी भाई, जब टिहरी में पहला रेडियो आया, टिहरी बांध के विस्थापित, एक हटी सर्वोदयी की मौन विदाई, जीरो प्वाईंट पर टिहरी, श्री देव सुमन के लिये, आचार्य चिरंजी लाल असवाल, पितरों की स्मृति में आदि आलेख लिपिबद्ध हैं। इन आलेखों में आपने चरित्र गढ़े नहीं हैं बल्कि वे हमारे बीच के ही जन नायक रहे हैं। सुन्दर लाल बहुगुणा ने ‘एक थी टिहरी’ के आमुख में लिखा भी है कि -‘यह पुस्तक एक ऐतिहासिक दस्तावेज साबित होगी और पहाड़ों से दूर-दराज रहने वाले पर्वतजनों के हृदयों को आलोड़ित करने वाली होगी। इस पुस्तक के द्वारा संस्मरणों को लिखने की एक नई शैली का प्रकटन हुआ है और यह अन्य लेखकों के लिये भी प्रेरणादायी होगी। प्रायः संस्मरण लेखक के इर्द-गिर्द ही घूमते हैं, परन्तु उन्होंने इसमें घटनाओं और स्थानों का विवरण देकर इन्हें व्यापक बना दिया है।’

‘डूबे हुए शहर में तैरते हुए लोग’! आलेख में लिखा है कि – ‘कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार जी कहते थे कि- ‘मैं 25-26 साल का नौजवान वकालत करके ही आया था कि राजा ने मुझे फांसी दिलाने का काम सौंप दिया। वह गोविन्दु की दिलेरी के कायल थे। उसने दिलेरी के साथ फांसी के तख्ते की सीढ़ियां चढ़ी थी और जनता -जनार्दन को चारों ओर घुमकर अभिवादन किया था और कहा था- जनु मैंन करे तनु क्वी न करियान लौ!(जैसा मैंने किया वैसा कोई मत करना)।’ इसी आलेख में कैप्टन साहब से ही संदर्भित एक अन्य वाक्यांश है- ‘ पुराने दरबार के अपने ग्रंथागार में कैप्टन शूरवीर सिंह दुर्लभ ग्रन्थों को निकालकार मेज पर सजा रहे हैं। बुलडोजरों की आवाज उनके सीने पर सैकड़ों हथोड़ों जैसा आघात कर रही है। अब वे कुर्सी पर मूक-बधिर की तरह खामोश बैठे हैं। उनके मुख से जोर से आवाज निकलती है- हाय मेरी किताबों का क्या होगा? मेरी किताबें, हाय, मेरी किताबें।’…..‘गुणानन्द पथिक के काव्य संग्रह ‘झंकार’ और ‘ललकार’ अब विलीन हो गये हैं।’ यह वाक्यांश आत्मा को अन्दर तक हिला गया।

तत्कालीन टिहरी के वैभव की झलक का एक अंश भी उल्लेखनीय है। लिखा है -‘भारत में सर्वप्रथम बिजली कलकत्ता में आयी थी। लेकिन इंग्लैण्ड से इंजीनियरिंग करके आए हुए महाराजा कीर्तिशाह ने भैंतोगी गधेरे से बिजली लाइन बिछाकर नया दरबार(राजमहल) में उससे भी पहले बिजली पहुंचा दी थी।’ लेकिन इतनी वैभवशाली टिहरी पर किसकी नजर लगी कि ‘28 दिसम्बर 1815 को ज्योतिषियों के निर्देेशन में स्थापित टिहरी शहर 29 अक्टूबर को हाईकोर्ट के आदेश पर डुबा दिया गया। यहां के लोग तितर-बितर होकर बिखर गये। एक शहर विकास की भेंट चढ़कर सदा के लिये पानी में समा गया। एक बिरादरी सदा के लिये बिखर गयी।’

‘जब टिहरी में पहला रेडियो आया’! इस आलेख में रेडियो का प्रसंग बड़ा रोचक है। लिखा है – ‘बात 1935 की है, रियासत टिहरी पर महाराजा नरेन्द्रशाह का शासन था। रियासत भर में महाराजा के पास ही एकमात्र रेडियो था। लेकिन इस रेडियो को साधारण नागरिक क्या, राज्य के उच्च अधिकारी भी न देख सकते थे । और न सुन सकते थे। रियासत के एक धनाढ्य व्यक्ति गुलजारीलाल असवाल ने महाराजा से अनुमति लेकर एक रेडियो खरीदा। रेडियो खरिदने के लिये चार दिन पैदल चलकर मसूरी पहुंचना पड़ा। ‘इमरसन’ कम्पनी के रेडियो एजेन्ट बनवारी लाल ‘बेदम’ से रेडियो खरीद कर कन्धे पर उठाकर लाया गया। रेडियो के टिहरी पहुंचने पर खूब उत्सव मनाया गया।’

‘जीरो प्वाइन्ट पर टिहरी’! यह आलेख जीवंत पात्रों को समेटती हुई डुबते शहर की एक लम्बी दास्तान है। इसी आलेख के एक स्थान पर साहित्यकार ‘डाॅ. महावीर प्रसाद गैरोला के सन्दर्भ में लिखते हैं कि -‘ डाॅ. महावीर प्रसाद गैरोला ने अपनी वसीयत भी लिख छोड़ी है- मैं टिहरी हूं। राजमहल मेरा सिर है और सेमल का तप्पड़ मेरे पैर। भागीरथी और भिलंगना मेरे पैर धोती है, सिमलासू और दोबाटा मेरे दांए-बांए हाथ हैं। घण्टाघर और चनाखेत मेरा हृदय है। सुमन चैक मेरी नाभि है। मैं डूबकर देशवासियों का कल्याण करूंगा। मैं तरणताल में जल-क्रीडा का जल बनूंगा। उद्योग-धन्धों के लिए विद्युत ऊर्जा बनूंगा। मैं झील की लहरों में, वन के झोंकों में, चन्द्रमा के प्रकाश में विलीन होकर अपने देशवासियों का कल्याण करूंगा।’ एक साहित्यकार के द्वारा दूसरे साहित्यकार के श्रीमुख से ऐसी भाव व्यंजना अन्यत्र पढ़ने को नहीं मिली।

‘जीरो प्वाइन्ट पर टिहरी’ में ही सिपाही विनाशानन्द समाचार लेकर आए हैं- ‘सर! एक आदमी मस्जिद के आगे सिर के बल उल्टा खड़ा है। वह कह रहा है- टिहरी नहीं डूबेगी।’ वहीं कुछ लोग -‘जीरो प्वाइन्ट पर कुछ लोग एक अर्थी को लेकर आए हैं। वह अर्थी आचार्य चिरंजीलाल असवाल की है। आचार्य ने अपने देहरादून निवास पर जब सुना कि टिहरी को डुबाने की पूरी तैयारियां की जा चुकी हैं तो इस समाचार को सुनकर नब्बे साल के आचार्य की हदृयगति रूक गई। उनकी वसीयत के अनुसार उनके पुत्र भागीरथी-भिलंगना के संगम पर उनका दाह-संस्कार करेंगे, पर शव यात्रा को जीरो प्वांईंट से आगे बढ़ने से रोक दिया गया है।’ उधर ‘संजू की नानी मरते दम तक अपने पूर्वजों के मकान को छोड़ना नहीं चाहती। वह अपने खण्डहर हुए मकान में ही रहने के लिए जगह बना रही है।’ दरोगा ने निर्देश दिया- ‘गाय को मेरे घर में ले जाकर खूंटे पर बांध दो। घोंसला बनाने का हुक्म आदमी या चिड़िया, किसी को नहीं है, इसलिए गौरेया को घोंसले सहित मेरे मकान की शहतीर पर रख दो।’

‘बाल सखा कुंवर प्रसून और मैं’! आपके ही सदृश्य बहुमुखी प्रतिभा के धनी कुंवर प्रसून आपके बाल सखा ही नहीं बल्कि हर एक जीवन संग्राम में आप साथ-साथ रहे। एक स्थान पर आप स्वंय लिखते हैं -‘तरूण शान्ति सेना’ जय प्रकाश नारायण द्वारा स्थापित तरूणों का संगठन था। जय प्रकाश नारायण की भांति ही हमनें भी अपने नाम से जाति सूचक शब्द हटा दिये थे। मैं प्रताप सिंह पंवार से प्रताप सिंह शिखर बना अैर कुंवर सिंह भण्डारी से कुंवर सिंह प्रसून बना, परन्तु इसमें भी लोग हमारा वर्ण जान जाते थे। अपना उदेश्य पूरा होने न देख हम दोनों ने नाम से सिंह शब्द भी हटा दिए थे। अब मैं प्रताप शिखर और वह कुंवर प्रसून बन गया।’ सखा भाव के ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं।

इसी आलेख में असकोट-आराकोट अभियान के दौरान मुनस्यारी का एक प्रेरणादायी प्रसंग है। प्रंसगवश कुछ यूं लिखते हैं-‘ यात्रा के दौरान सभी व्यवस्थाएं स्वयं ही करनी पड़ती थी। हर सभा के बाद 25 पैसे कीमत की पुस्तिकाएं बेचा करते थे। मुनस्यारी में सुन्दरलाल बहुगुणा जी को हिसाब मिलाने पर 25 पैसे कम मिले। उन्हें संदेह हुआ कि प्रताप शिखर और कुंवर प्रसून 25 पैसे की चाय पी गये हैं। उन्होंने नाराज होकर कहा- ‘ यदि मैं तुम्हारा परीक्षक होता तो साक्षात्कार में तुम्हें फेल कर देता। तुम जानते हो सार्वजनिक जीवन में तीन बातों का विशेष ध्यान रखना होता है। धन का सदुपयोग, समय की पाबन्दी और चरित्र की मजबूती।’ संस्थाओं की संख्या आज भले ही बढ़ी है किन्तु ऐसे पथ प्रदर्शक और जन सेवकों का मिलना दुर्लभ है।

‘पितरों की स्मृति में’! आलेख हमें अपनी पैतृक संपदाओं, आचार-विचार का स्मरण करवाता है। लिखा है – ‘दादा के शब्दकोष में एक की गिनती ही नहीं थी। जब भी मिर्ची और अनाज के पाथे भरते थे तो एक की गिनती को ‘बरकत’ कहते थे। बरकत के बाद सीधे दो की गिनती गिनते थे।’ – ‘अनाज के कोठार, भण्डार और बीजों की तोमड़ियां दादी की व्यवस्था थी। दीवारों पर भिन्न-भिन्न बीजों की तोमड़ियां रहती थी। नमक भी एक तोमड़ी में रहता था। दूध, दही के लिये एक अलग कमरा रहता था, उस पर मात्र दादा का ही अधिकार था। -फास्ट फूड के इस युग में दादी ‘बाड़ी’ और सत्तु महत्वहीन हो गये हैं। दादा का अगेला और हुक्का कहीं खो गये हैं। मेरे पिता का जनेऊ और उस पर बंधी गांठें गुजरे जमाने की बात हो गयी है। फ्रिज में कैद साॅस की बोतलों ने मां के किचन गार्डन को पराजित कर दिया है। टी.बी. सी.डी. और डी.जे. ने पे्रमदास के ढोल-दमाऊ की आवाज बन्द कर दी है।’

ऐसे एक नहीं अनेकों सारगर्भित प्रसंग आपकी कहानियों, आपके आलेखों में मिलते हैं। समस्त कहानियों और आलेखों के भावों को एक ही आलेख में समेटना कठिन है। यूं तो आप लम्बे समय से अस्वस्थ थे। किंतु अस्वस्थता में भी लेखनरत थे। इसलिए सभी आश्वस्त थे कि अन्य अनेकों जंगों की भांति यह जंग भी आपने जीतनी ही है। किंतु 25 मार्च 2012 को दुखदायी खबर मिली कि प्रताप शिखर न रहे!! आप खाड़ी ही नहीं अपितु समग्र देवभूमि के कण-कण को एक क्षण के लिए निशब्द कर गये।

जन सरोकारों से जुड़ी उत्तराखण्ड की प्रतिनिधि पत्रिका ‘युगवाणी’ के जुलाई 2012 के अंक में किशन सिंह चौहान ने भावपूर्ण श्रद्धांजलि व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘प्रताप शिखर अपने पीछे जहां भरा-पूरा परिवार छोड़ गए युवाओं और विशेष रूप से पहाड़ के गांवों में कुछ कर-गुजरने की इच्छा शक्ति रखने वाले लोगों के लिए उम्मीद की ऐसी किरण छोड़ गए जिससे प्रेरणा लेकर उत्तराखण्ड के ग्रामीण जीवन की सुख समृद्धि से संजोया जा सकता है।’ वहीं जनकवि अतुल शर्मा के शब्द हैं- ‘उनकी सहजता और सक्रियता के कारण ही उनकी यश पताका फैली। सब उनका नाम आजीवन आदर से लेते रहे और आगे भी लेते रहेंगे।’ वास्तव में अपनी सक्रियता, वैचारिक प्रखरता, शोषितों वंचितों के कल्याण के लिए तत्पतरता तथा अन्य अनेक जन सरोकारों के प्रति अटूट निष्ठा से उन्होंने समाज के बहुत बड़े हिस्से का जो सम्मान अर्जित किया वह दुर्लभ है।

निसंदेह, आपके विचार आज भी प्रवाहमान हैं। वर्तमान में आपकी संस्था ‘उत्तराखण्ड जन जागृति संस्थान’ का संचालन आपके पुत्र अरण्य रंजन कर रहे हैं। उम्मीद है निकट भविष्य में अनुज अरण्य रंजन आपके समग्र प्रकाशित-अप्रकाशित गढ़वाली हिन्दी साहित्य, पत्रोतर को जिल्दों में पाठकों के सामने रखेंगे। ताकि भावी पीढ़ी आपके विचारों, लाभ-लोभ रहित संस्कारों से लाभान्वित हो सके।

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आप सच्चे जन सेवक उच्च कोटि के कलमकार रहे। आप भगीरथ के समतुल्य ही युगों-युगों तक पूज्य रहेंगे! पुण्यात्मन! इन पंक्तियों के विराम के साथ हेंवल की जलांजलि सहित मेरा दाण्डिक प्रणाम स्वीकार करें!

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