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जन्मदिवस पर विशेष |मदन मोहन डुकलान|समय व समाज की नब्ज टटोलता साहित्यकार| साभार-आशीष सुंदरियाल

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सिटी लाइव टुूडे, साभार-आशीष सुंदरियाल

साहित्य समाज का दर्पण होता है इसलिए एक उत्कृष्ट साहित्य या साहित्यकार समय के संदर्भों को शब्दों में उकेरते हुये अपनी सभ्यता, समाज एवं संस्कृति को परिलक्षित करता हुआ आगे बढ़ता है एवं अपने आस-पास के घटनाक्रम को आत्मसात् करते हुये संप्रेषणीय व चिर-स्थायी साहित्य का सृजन करता है। साहित्य की यह विशिष्टता हिन्दी व गढवाली़ भाषा-बोली के रचनाकार मदन मोहन डुकलान के साहित्य सृजन में प्रमुखता के साथ दृष्टिगोचर होती है। वे अपनी रचनाधर्मिता से समय की नब्ज़ टटोलते हुये अपनी साहित्य सृजन यात्रा को आगे बढ़ाते हैं।
ऑंचलिक कथ्य एवं तथ्य को अपने साहित्य सृजन की मुख्य विषय-वस्तु रखते हुये भी सार्वभौमिक सत्य को बडी़ सरलता से अभिव्यक्त कर देना मदन मोहन डुकलान की सृजन क्षमता की विशेषता है। कभी ‘लोक’ की लालिमा तो कभी ‘आधुनिकता’ की चकाचौंध परस्पर रूप से उनकी रचनाओं में उजागर होती है। वे बदलाव को बड़ी बारीकी से पकडते हुये प्रयोगवादी सोच के पक्षधर हैं तथा जनपक्षीय विचारधारा का समर्थन करते हुये नज़र आते हैं।आम जनमानस के दु:ख-दर्द, हर्ष-उल्लास एवं बात-विचार उनकी साहित्य सामग्री का मुख्य आधार है और वे देश व समाज को सर्वोपरि मानते हुये मानव कल्याण की कामना करते हैं।

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उनके प्रथम गढवाली कविता संग्रह “आंदि-जांदि सांस” में संकलित रचना ‘ईश्वर’ में कुछ इसी तरह के भाव नज़र आते हैं….
ईश्वर
नि रैंदो
मंदिर मस्जिद
माद्यो मा
ढुंगा-माटा मूर्त्यों मा
वो रैंद
हरा-भरा पातु मा
धाण करदा हाथु मा
खिलदा फुल्लु कि पाख्यूं मा
नन-तिनौ कि आंख्यूं मा

  वर्तमान में गढवाली़ बोली-भाषा के प्रतिष्ठित साहित्यकारों में शुमार मदन मोहन डुकलान की साहित्य में बचपन से ही रुचि रही है। दिल्ली में अपनी आरम्भिक शिक्षा ग्रहण करते हुये कक्षा-10 में पहली बार उन्होंने कविता लिखी जिसे उनकी हिन्दी की अध्यापिका ने बहुत सराहा व उन्हें आगे लिखते रहने के लिए प्रेरित किया। इसके उपरान्त वे देहरादून आ गये और डी.ए.बी (पी.जी) कॉलेज में पढ़ाई के दौरान भी उनका कविता लेखन जारी रहा और वे निरन्तर साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय रहे।उनकी रचनाएँ ‘कादम्बिनी’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में भी छपनी शुरु हो गयी थी। इसी दौरान मदन मोहन डुकलान कुछ साहित्यकारों के सम्पर्क में आये जो उनकी मातृभाषा गढवाली़ में लेखन कार्य कर रहे थे। इस घटनाक्रम से मदन डुकलान के साहित्यिक जीवन में एक बहुत बड़ा बदलाव आया और वे अपनी मातृभाषा की भावाभिव्यक्ति व शब्द-सामर्थ्य से इतने प्रभावित हुये कि उन्होंने अपने साहित्य सृजनशीलता को अपनी मातृभाषा के लिए समर्पित कर दिया।

गढवाली़ के मूर्धन्य साहित्यकार मदन मोहन डुकलान ने अपनी मातृभाषा गढवाली़ में साहित्य सेवा का प्रारंभ सन् 1985 में एक गढवाली़ पत्रिका “चिट्ठी” के सम्पादन व प्रकाशन से किया। इसके उपरान्त उन्होंने एक गढवाली़ कविता पोस्टर (1991) और पहला गढवाली़ कैलेण्डर (1993) का सम्पादन व प्रकाशन भी किया जिसमें समकालीन लब्ध-प्रतिष्ठित गढवाली़ साहित्यकारों की रचनाएँ प्रकाशित हुयी। कालान्तर में मदन डुकलान के इन अभिनव प्रयोगों ने एक त्रैमासिक पत्रिका “चिट्ठी-पत्री” का रूप ले लिया जो निरन्तर पुराने व नये रचनाकारों को मंच प्रदान करती आ रही है व गढवाली़ साहित्य, समाज व सृजन के दस्तावेज़ के रूप प्रकाशित हो रही है। इसके अतिरिक्त ‘अंग्वाल़’ के नाम से 250 से अधिक गढवाली़ कवियों की कविताओं का संकलन व सम्पादन तथा ‘हुंगरा’ शीर्षक से 100 उत्कृष्ट गढवाली़ कथाओं का संकलन व सम्पादन गढवाली़ साहित्य के संरक्षण एवं सम्वर्धन में मदन मोहन डुकलान का ऐतिहासिक एवं अविस्मरणीय योगदान है। इसके साथ ही समकालीन 18 प्रतिनिधि कवियों के गढवाली़ कविता संग्रह ‘ग्वथनी का गौं बटे’ का सम्पादन भी मदन डुकलान द्वारा किया है।


गढवाली़ साहित्य में साठोत्री कविता के प्रतिनिधि कवियों में से एक व ग़ज़ल जैसी बिल्कुल नयी शैली की रचनाओं को गढवाली़ साहित्य में प्रतिष्ठापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मदन मोहन डुकलान की स्वरचित (गढवाली़) रचनाओं की पहली पुस्तक ‘आंदि-जांदि सांस’ 2001 में प्रकाशित हुयी। इस पुस्तक में नयी कविता के साथ-साथ गढवाली़ ग़ज़लों को भी प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। ग़ज़ल विधा को गढवाली़ साहित्य में स्थापित करने में मदन डुकलान की इन ग़ज़लों का बड़ा योगदान है। वहीं उन्होंने अपनी अकविता या अतुकान्त कविताओं में कई ऐसे बिम्ब एवं प्रतीकों का प्रयोग किया जो गढवाली़ साहित्य में इससे पहले अमूमन काफी कम देँखा गया था। इसके उपरान्त सन् 2014 में उनकी दूसरी पुस्तक ‘अपणो ऐना अपणी अन्वार’ प्रकाशित हुयी। इसमें कविता, गीत व ग़ज़ल तीनों ही शैली की रचनाओं का संकलन किया गया है और सभी रचनाएँ बिल्कुल नये तेवर के साथ सामने आती हैं जो गढवाली़ की इन रचनाओं को आधुनिक समय में अन्य भाषाओं के समकक्ष लाने में पूर्णतया समर्थ हैं। उनकी दूसरी किताब “अपणो ऐना अपणी अन्वार” में उनकी पहली पुस्तक ‘आंदि-जांदि सांस’ का ज़िक्र करते हुये गढ़वाली गीत-संगीत के सुविख्यात गायक/गीतकार श्री नरेंद्र सिंह नेगी जी लिखते हैं कि “पैलि पुस्तक ‘आंदि-जांदि सांस’ मा मदनन वूं लोगों सांस रोकि यालि छै जो अपणी मातृभाषा तै हीन भावना वश भाषा नि माणदा।” श्री नेगी जी की इन पंक्तियों से मदन डुकलान की लेखन प्रतिभा और सृजनशीलता का अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है।


मदन मोहन डुकलान को मुख्यत: गढवाली़ सम्पादक, लेखक व कवि के रूप में जाना जाता है परन्तु गढवाली़ कवि/ साहित्यकार के रूप में स्थापित इस क़लमकार ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुवात हिन्दी की कविताओं से की और सन् 2014 में उनकी हिन्दी कविताओं का संग्रह ‘चेहरों के घेरे’ प्रकाशित हुआ। यह संग्रह कवि की शुरुवाती दौर की रचनाओं का संकलन है जिसमें भाषा हिन्दी होने के बावजूद भी पहाड़ में अनेक समस्याओं से जुझते हुये युवा का दर्द आक्रोश के रूप में सामने आता हुआ प्रतीत होता है। इन रचनाओं में बिना किसी लाग-लपेट के सीधे व सरल शब्दों में कही गयी बातें व्यवस्था की विसंगतियों पर कठोर प्रहार करती हैं और भुक्तभोगी जनता से सीधा संवाद स्थापित करने में सफल होती हैं। ‘चेहेरों के घेरे’ कविता संग्रह के अतिरिक्त ‘इन दिनों’ व ‘प्रयास’ कविता संकलनों में भी मदन डुकलान की हिन्दी रचनाएँ अन्य समकालीन एवं स्थापित रचनाकारों की रचनाओं के साथ संकलित हैं। इसके अलावा मदन डुकलान अनेक स्मारिकाओं व अनियमित पत्र- पत्रिकाओं का भी समय-समय पर सम्पादन करते आये हैं।

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साहित्य सृजन के अतिरिक्त मदन मोहन डुकलान को एक रंगकर्मी के रूप में भी जाना जाता है। रामलीला में वानर के अभिनय से शुरु हुआ उनका सफ़र रंगमंच से होता हुआ उत्तराखण्ड सिने जगत तक पहुँच चुका है। वे अनेक नाटकों व उत्तराखण्ड फ़िल्मों/ चलचित्रों में अभिनय के साथ-साथ गीतकार व निर्देशक के रूप में भी अपनी भागीदारी निभा चुके हैं।
सरल व सौम्य स्वभाव के मदन मोहन डुकलान के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व को समाज में भी काफी सम्मान व सराहना मिली है। इसी का प्रतिफल है कि उन्हें अभी तक उत्तराखंड संस्कृति सम्मान, दून श्री सम्मान, डॉ गोविन्द चातक सम्मान (उत्तराखंड भाषा संस्थान), उत्तराखंड शोध संस्थान सम्मान, कन्हैयालाल डंडरियाल स्मृति साहित्य सम्मान के साथ ही साथ सर्वश्रेठ अभिनेता (नाटक- प्यादा), गोकुल आर्ट्स नाट्य प्रतियोगिता, वाराणसी, सर्वश्रेठ अभिनेता (फिल्म: याद आली टिहरी)- यंग उत्तराखण्ड सिने अवार्ड, सर्वश्रेठ अभिनय-नेगेटिव रोल (फिल्म: अब त खुलली रात)- यंग उत्तराखण्ड सिने अवार्ड एवं यूथ आइकॉन अवार्ड जैसे अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।
साहित्य, संस्कृति एवं रंगमंच व फ़िल्म अभिनय जैसे अनेक माध्यमों से अपने साहित्य, समाज एवं संस्कृति को समृद्ध एवं संरक्षित करने के प्रयासों में सतत् प्रयत्नशील मदन मोहन डुकलान की साहित्य यात्रा आज भी अनवरत रूप से जारी है। वे साहित्य सृजन तथा सम्पादन के क्षेत्र में निरन्तर नये अध्याय जोड़ते जा रहे हैं और नयी पीढ़ी के लिए नये प्रतिमान स्थापित कर रहे है।उनके यह प्रयास भविष्य में निःसन्देह मील का पत्थर साबित होंगे व साहित्य प्रेमियों व शोधार्थियों के अमूल्य धरोहर के रूप में काम करेंगे।

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