जानिये | भगवान शिव के नेत्र से उत्पन्न “रुद्राक्ष” धारण के फायदे |पढ़िये पूरी खबर

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सिटी लाइव टुडे, मीडिया हाउस-प्रस्तुति- आचार्य पंकज पैन्यूली(ज्योतिष एवं आध्यात्मिक गुरु)संस्थापक-भारतीय प्राच्य विद्या पुनुरुत्थान संस्थान ,ढालवाला ऋषिकेश।

‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍हिन्दू धर्म  के सभी धर्मग्रंथों में भगवान रुद्र (भगवान शिव का एक नाम)के नेत्र विंदु से उत्पन्न “रुद्राक्ष” की महिमा का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है,वस्तुतः “रुद्राक्ष”एक विशेष प्रकार की  सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है,और शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाये रखने में मदद करता  है। इतना ही नही “रुद्राक्ष”धारण करने मात्र से तमाम समस्याओं का समाधान हो जाता है,जिसमें नवग्रह जनित दोष भी सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन चिकित्सा पद्धति में भी  उपचारार्थ”रुद्राक्ष”का प्रयोग होता चला आ रहा है।

अतः आज हम अद्धभुत दैवीय गुणों से युक्त रुद्राक्ष के बारे में विस्तारपूर्वक समझने का प्रयास करेंगे। क्योंकि एक सामान्य सिद्धान्त है, कि जो विषय-वस्तु अधिक प्रचलित होती है,उसके बारे में उतने ही अपवाद,भ्रांतियां और कुछ गलत धारणाएं भी गढ़ी जाती हैं,वहीं दूसरी तरफ बहुत सारे ऐसे जिज्ञासू लोग भी होते हैं,जो तत्सम्बन्धी विषय-वस्तु के बारे में प्रामाणिक एवं तथ्यात्मक जानकारी चाहते। अतः आज हम इस लेख के माध्यम से “रुद्राक्ष”के बारे में विस्तृत,तथ्यात्मक और प्रामाणिक जानकारी विन्दुवार प्रस्तुत कर रहे हैं। जो सभी के लिए  उपयोगी है।       

   1.रुद्राक्ष क्या है- “रुद्राक्ष”इलाओ कार्पस गैनीट्र्स”पेड़ का बीज है, अर्थात एक फल की गुठली है।अध्यात्म से प्रेरित साधकों के जीवन में इसका बहुत बड़ा महत्व हैं।                                                                                                                                               

2.रुद्राक्ष की उत्त्पत्ति कैसे हुई-पौराणिक मान्यता अनुसार रुद्राक्ष की उत्त्पत्ति भगवान शंकर की आँखों के जलविंदु से हुई है, इसीलिए इसे रुद्राक्ष कहा जाता है।       

3.रुद्राक्ष का शाब्दिक अर्थ-वस्तुतः ” रुद्राक्ष” संस्कृत भाषा का एक योगिक शब्द है,जो  रुद्र और अक्सा (संस्कृत में अक्ष) नामक शब्दों से मिलकर  बना है।”रुद्र’भगवान शिव के वैदिक नामों में से एक है,और “अक्सा”अश्रु की बूंद। अर्थात रुद्र धन अक्ष बराबर रुद्राक्ष। अतः”रुद्राक्ष”के शाब्दिक अर्थ से यह स्पष्ट हो जाता है, कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान रुद्र के आंसू से ही हुई है।   

आचार्य पंकज पैन्यूली(ज्योतिष एवं आध्यात्मिक गुरु)संस्थापक-भारतीय प्राच्य विद्या पुनुरुत्थान संस्थान ,ढालवाला ऋषिकेश।

      4.रुद्राक्ष कहाँ पैदा होता है-इसके पेड़ मुख्य रूप से ऊंचे पहाड़ी इलाकों में एक खास ऊंचाई पर हिमालय में पाये जाते हैं। शोध के अनुसार पाया गया है कि वर्तमान में हमारे देश में “रुद्राक्ष” के पेड़ बहुत कम बच्चे हैं, आज के समय में ज्यादातर रुद्राक्ष के पेड़ नेपाल,वर्मा,थाइलैंड या इंडोनेसिया में पाये जाते हैं। दक्षिण भारत में पश्चिमी घाट के कुछ इलाकों में भी रुद्राक्ष के पेड़ होते हैं,लेकिन अच्छी गुणवत्ता वाले रुद्राक्ष हिमालय में एक विशेष ऊंचाई के बाद मिलते हैं, इसका मुख्य कारण यह है कि मिट्टी,वातावरण और अन्य चीजों का प्रभाव इस पर पड़ता है।उसके बाद ही इसमें एक विशिष्ट प्रकार का स्पन्दन पैदा होता है।।                                            .                    

5.रुद्राक्ष धारण करने के फायदे-रक्त चाप को नियंत्रित करता है, हमारे शरीर में बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य करने वाली तंत्रिकाओं को शांत करता है, और स्नायू तंत्र में एक तरह की शांति और सतर्कता लाता है।  इसके अतिरिक्त चूंकि रुद्राक्ष सदैव  सकारात्मक ऊर्जा का  संचार करता है, फलस्वरूप धारक के आसपास की सभी  नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित कर एक सुरक्षा कवच का काम करता है। जिस कारण व्यक्ति सदैव सकारात्मक ऊर्जा से ओतप्रोत रहता है। और इस बात को सभी जानते हैं, कि जीवन में सफल और खुशहाल वही लोग रहते हैं, जो सकारात्मक सोच और सकारात्मक ऊर्जा वाले होते हैं।व्यक्ति के मूल जिन।                         .                                       

6.रुद्राक्ष से जुड़ी कुछ विशेष बातें-a.किसी अन्य के द्वारा धारण किया गया “रुद्राक्ष”नही पहनना चाहिए।     b.रुद्राक्ष पहनने से एकाग्रता और स्मरण शक्ति मजबूत होती है।                                                              c. रुद्राक्ष को चांदी,सोने,तांबे या पांच धातु में पहनना चाहिए।लाल या काले धागे में भी पहना जा सकता है।।   उत्तम क्वालिटी का रुद्राक्ष 40 दिनों के अन्दर अपना शुभ प्रभाव देता है।।                                              .          .                                                             

7.रुद्राक्ष धारण करने के नियम-a.रुद्राक्ष कलाई,कंठ और गले में ह्रदय प्रदेश तक धारण किया जा सकता है, लेकिन कंठ प्रदेश तक धारण करना सर्वोत्तम होता है।। b.कलाई में 12,कंठ में 36,और गले में ह्रदय तक 108 दानों को धारण करना चाहिए।।                               C.सावन में, सोमवार को या शिवरात्रि के दिन रुद्राक्ष धारण करना सर्वोत्तम होता है।                                 d.रुद्राक्ष धारण करने से पूर्व उसकी शुद्धि  पुनः ॐ नमः शिवाय मंत्र द्वारा अभिमंत्रित  करना चाहिये।।          d.रुद्राक्ष धारण करने वालों को सात्त्विक आहार ही लेना चाहिए,तथा विचारों और आचरण को शुद्ध रखना चाहिए।।                                                              .       8.किन स्थिति में रुद्राक्ष धारण नहीं   करना चाहिए-a.मांस मदिरा का सेवन करने पर। b.सोते समय। c.शवयात्रा में जाने पर। d.सूतक (स्वयं या निजि परिजनों के घर बच्चा) होंने पर,शुद्ध होने तक रुद्राक्ष नही पहिनना चाहिए।                                           e.महिलाओं को मासिक चक्र के दौरान रुद्राक्ष धारण नहीं करना चाहिए।   ।                                        

   8. मुख के अनुसार रुद्राक्ष के प्रकार-शास्त्रों में एक मुखी से लेकर 21 मुख वाले रुद्राक्ष का वर्णन किया गया है, लेकिन वर्तमान समय में उपलब्धता एक मुखी से लेकर 14 मुखी तक ही है।  मुख के अनुसार रुद्राक्ष के गुण,प्रभाव,फायदे अलग-अलग होते हैं।।            

9.राशि के अनुसार कौन सा मुखी रुद्राक्ष धारण करें- मेष राशि-तीन मुखी, वृष-छः मुखी,मिथुन-चार मुखी,कर्क राशि-दो मुखी, सिंह राशि -बारह मुखी,कन्या राशि -एक मुखी,तुला राशि-छः मुखी,वृश्चिकराशि -तीन मुखी, धनु राशि-पांच मुखी,मकर राशि-सात मुखी,कुम्भ राशि -सात मुखी,मीनराशि -पांच मुखी।                                                                  

    10.असली रुद्राक्ष की पहिचान-दुकान में बिकने वाला हर रुद्राक्ष असली ही हो इसकी कोई गारण्टी नही होती है, चूंकि कुछ मुखी रुद्राक्ष अति दुर्लभ होने के कारण बहुत कीमती भी होते हैं, जिस कारण कुछ व्यापारी लोग  अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए कैमिकल आदि का प्रयोग कर असली रुद्राक्ष के मुख व आकार आदि में परिवर्तन कर बेच लेते हैं, यहाँ तक भी देखा गया है कि रुद्राक्ष के ऊपर बड़ी सफाई से गणेश,सर्प,शिवलिंग की आकृति भी बना दी जाती है। और बहुत महँगे भाव में बेच दिया जाता है।  अतः इस लेख के माध्यम से हम आपको असली रुद्राक्ष

पहचानने की सरल विधि बताने का प्रयास कर रहे हैं। ताकि आप जब भी रुद्राक्ष खेरीदें तो वह असली ही हो। तो आएं,असली रुद्राक्ष की पहिचान क्या है,विन्दुवार समझने का प्रयास करेंगे।।      1.किसी कटोरे आदि वर्तन में पानी उबालें,  उस उबलते पानी में एक दो मिनट के लिये रुद्राक्ष डाल  दें। फिर वर्तन चूल्हे से उतारकर ढक दें।लगभग पांच मिनट बाद ढ़क्कन हटाकर देखें ,यदि रुद्राक्ष का रंग न उतरा  हो,और ना ही कोई अन्य परिवर्तन दिखाई दें,तो रुद्राक्ष असली होता है।।                                                 2.रुद्राक्ष को पानी में छोड़ लें,यदि रुद्राक्ष डूब जाये तो रुद्राक्ष असली नही होगा।।                                      3.यदि रुद्राक्ष में जोड़ लगाया हो,तो वह फट जायेगा।इसी प्रकार उसमें गणेश,सर्प आदि की आकृति चिपकाई गई हो,तो वह भी अलग हो जायेगी।                         4.कुछ लोग  रुद्राक्ष  के  मुखों में परिवर्तन कर लेते हैं, खुरचने पर मुख खुल जांय तो रुद्राक्ष नकली होता है।।     4. रुद्राक्ष को खुरेदने पर यदि रेशा निकले तो असली और रसायन जैसा पदार्थ निकले तो नकली।।             5.सरसों तेल में डालने पर रुद्राक्ष और अधिक गहरे रंग में परिवर्तित हो जाय तो वह असली होता है।।          6.रुद्राक्ष के ऊपरी पठार उभरे हों तो,तो वह भी असली होता है।।                                                            

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11.नकली रुद्राक्ष कैसे बनाये जाते हैं-वेर की गुठली पर कुशल कारीगरी द्वारा रंग चढ़ाकर रुद्राक्ष की शक्ल दी जाती है। संभवतः इसके अतिरिक्त कुछ और भी प्रक्रिया सम्मिलित हो सकती है। इस प्रकार रुद्राक्ष के बारे में जो आवश्यक जानकारी है,उसे आप तक पहुंचाने का हमने एक छोटा  सा प्रयास मात्र  है

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