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अस्तित्व की लड़ाई लड़ता आंचलिक सिनेमा | प्रस्तुति-जयमल चंद्रा

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सिटी लाइव टुडे, मीडिया हाउस-प्रस्तुति-जयमल चंद्रा


80 के दशक में निर्माता निर्देशक पराशर गौड़ व तुलसी धेमेरे कृत पहली आंचलिक फिल्म ‘जग्वाल‘ से शुरू होकर आंचलिक सिनेमा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कटिव सुख कटिव दुःख। ‘‘रैबार‘‘ कौथिक‘‘बटवारु‘‘बेटी-ब्वारी‘‘चक्रचाल‘‘सुबेरो-घाम जैसी दमदार फिल्मो ने अपनी उपस्थिति बॉलीबुड में दर्ज कराई, साथ ही बॉलीबुड के सदाबहार व सुबिख्यात गायको,लता मंगेशकर,आशा भोसले,महेंद्र कपूर,कुमार सानू,उदित नारायण,सुषमा श्रेष्ठ आदि ने आंचलिक फिल्मो में अपनी आवाज का जादू बिखेरा।

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1986 में प्रदर्शित बद्री-केदार मूवीज बी डी नॉटियाल कृत ‘‘घरजवै‘‘ फिल्म जिसे गढ़वाली शोले के नाम से भी जाना गया,पर्दे पर आई। इस फिल्म से जुड़े हर कलाकार को नई पहचान मिली। आर्थिक संसाधनों की कमी के अभाव में भी दर्जनों छोटी बड़ी फिल्मो-अल्बमों का निर्माण हुआ, मगर अफसोस अन्य भाषाओं की फिल्मों की तरह यह आंचलिक सिनेमा अपनी मंजिल तक नही पहुँच पाया।

फाइनेंसरों व डिस्टिब्यूटरों का अभाव, सिनेमाघर मालिकांे व सरकार की उदासीनता के कारण अलग राज्य बनने के बाद भी आंचलिक सिनेमा व उससे जुड़े जनमानस लड़खड़ा रहे है।

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