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बज रही खतरे की ” घंटी ” और खामोश ” मिठ्ठा छुयांल “| साभार-कमल उनियाल

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सिटी लाइव टुडे, साभार-कमल उनियाल


पलायन की मार झेल रहे पहाड़ की व्यथा की कथा की लिस्ट काफी बड़ी है। पलायन से गांव के गांव खाली हो रहे हैं और बाकी कसर जंगली जानवरों ने पूरी कर दी है। द्वारीखाल क्षेत्र में तो जंगली जानवरों ने नाक में दम कर रखा है। खेतीबाड़ी को चौपट करके अन्नदाताओं की मेहनत पर पानी फेर रखा है तो इंसानों को भी डराया हुआ है। अब तो गांवों के गुठ्यारों तक जंगली जानवरों की दस्तक ने खतरे की घंटी बजा दी है। हैरानी की बात तो यह है कि इस खतरे की घंटी की आवाज मिठ्ठा छुयांलों यानि नेताजी को भी सुनायी देती है। ये politician मिट्ठा छुयांल जिक्र भी करते हैं और फिक्र भी जताते हैं लेकिन फिक्र है नहीं।


पहाड़ के गांव-गांव की कहानी कमोबेश ऐसी ही है। लेकिन यहां केवल जनपद पौड़ी के द्वारीखाल क्षेत्र का ही जिक्र कर रहे हैं। विकास खंड द्वारीखाल के निकटवर्ती गाँव ग्वीन छोटा, ग्वीन बडा बखरोडी, थानखाल भलगांव बाजा गाँव में इन दिनों बाघ और गुलदार ने ग्रामीणों की रातों की नींद उड़ा कर रख दी है। हालांकि इन दिनों रहस्यमयी की दस्तक बंद हो रखी है। इस रहस्यमयी का जिक्र हम कई खबरों में कर चुके हैं। इस खबर में अन्य जंगली जानवरों के आतंक के बारे में बता रहे हैं।

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बीते दिनों की ही बात है। ग्रामीण संजय सिंह, सोहन सिह के बकरी को गुलदार ने घात लगाकर जंगल ले जाते समय निवाला बना दिया। ग्रामीण अनिल, जगत सिह की गाय का भी मार डाला। उधर, खेती भी लंगूर बंदर तथा सुअरों के कारण चौपट हो गयी है। किसान हाड़तोड़ मेहनत कर खेती करते हैं लेकिन जंगली जानवर किसानों की मेहनत पर पानी फेर देते हैं।

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ग्रामीण महिला पवित्रा देवी अनिता देवी ने बताया बंदर घर के अंदर से ही खाद्य सामग्री उठाकर ले जाते हैं तथा भगाने पर बच्चों महिलाओं पर हमला कर रहे हैं। ऐसे मंें ग्रामीण घरों के अंदर भी स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
क्षेत्र के मेहनतकश किसानों व पशुपालको ने अपना दुख साझा करते हुए कहा कि अगर समय रहते हुए सरकार ने इन हिंसक जानवरों को रोकने का कारगर उपाय नहीं किया तो खेती तथा पशुपालन करना दूभर हो जाएगा। किसानों व पशुपालकों की इस पीड़ा कौन सुनेगा। सुलगता हुआ सवाल यह है। आखिर इसका जवाब देगा कौन, आखिर कौन, आखिर कौन, आखिर कौन।

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