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first time| किसने लिखा व गाया| बेडु पाको बारामासा| साभार- वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल

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सिटी लाइव टुडे, मीडिया हाउस-साभार- वरिष्ठ पत्रकार मनोज इष्टवाल


तन व मन में ताजगी भरने वाला सादगी से गाया जाने वाला सदाबहार गीत बेडु पाको बारामासा गीत तन व मन में थिरकन पैदा कर देता है। यह वह गीत है जो उत्तराखंड के चर्चित गीतों में शुमार है। उत्तराखंड में विवाह से लेकर अन्य मांगलिक मौकों पर यह गीत बजता ही बजता है। यह वह गीत है जो गैर-पहाड़ी क्षेत्रों में भी आज भी खूब बजता है और हर कोई इसमें जीभर के झूमता है। क्या कभी आपने जाने की कोशिश की कि आखिर इतने लोकप्रिय गीत की रचना कैसे व किसने की और इसे सबसे पहले किसने गाया। सिटी लाइव टुडे मीडिया की इस खास रिपोर्ट में इस लोकप्रिय गीत के इन्हीं पक्षों को समझने की कोशिश करते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस विषय पर सटीक तौर पर कुछ भी कहना संभव नहीं है। वजह, लोक-संस्कृति के जानकार इस पर एकमत नहीं हैं। वरिष्ठ पत्रकार व लोक-संस्कृति के तमाम पहलुओं पर शोध करने वाले मनोज इष्टवाल manoj istwal ने बेडु पाको बारामासा गीत को लेकर श्रेष्ठ व वरिष्ठ साहित्यकारों की राय जाननी चाही तो इस गीत को साहित्यकार एकमत होते नजर नहीं आये। पेश है वरिष्ठ पत्रकार व लोक-संस्कृति के तमाम पहलुओं पर शोध करने वाले मनोज इष्टवाल की साहित्यकारों से हुयी बातचीत।

1- श्रीनगर में डॉ. शेखर पाठक ने कहा इसे पहली बार गढ़वाली सिपाही ने अल्मोड़ा में गाया।
2- मूर्धन्य साहित्यकार जुगलकिशोर पेटशाली बोले- मैंने अपनी किताब में 12 पेज का लेख लिखा है। इस गीत का मूल नेपाल से सम्बंधित।
3- साहित्यकार डॉ योगेश धस्माना के अनुसार यह गीत सर्वप्रथम 1924 में गाया गया था जबकि बिजेंद्र लाल शाह ने इसे में 1927 में अपने हिसाब से लिखा।

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फिर क्या स्वतंत्र भारत में रूस के राष्ट्राध्यक्ष के आगे जो रचना बिजेंद्र शाह द्वारा लिखित व मोहन उप्रेती द्वारा संगीतबद्ध व नाइमा ख़ान व साथियों द्वारा गायी गई थी वह मूल रचना नहीं थी?

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क्या हैं वरिष्ठ पत्रकार व लोक-संस्कृति के तमाम पहलुओं पर शोध करने वाले मनोज इष्टवाल
मेरे हिसाब से बेडु पाको बारामासा किसी एक की रचना नहीं है बल्कि जिसका जैसा मन हुआ वह इसमें पुट जोड़ता गया और यह जिस इलाक़े में गाया गया उसने अपने हिसाब से इसमें शब्द जोड़े। अतः यह एक ऐसा लोकगीत हुआ जिसका कोई एक रचनाकार वर्तमान में नहीं कहा जा सकता।

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