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चाउमीन-पिजा तो खा| कभी अरसा भी चाखी जा- खैकी जा| लेकिन कैसे| जयमल चंद्रा की रिपोर्ट

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सिटी लाइव टुडे, जयमल चंद्रा, द्वारीखाल


लोक-साहित्य, गीत व कविताओं में पहाड़ी व्यंजनों का जिक्र भी है और फिक्र भी। लेकिन यह केवल यही तक सीमित है। सच्चाई तो यह है कि पहाड़ी व्यंजन प्रचलन से आउट होते जा रहे हैं। इन्हीं व्यंजनों में शामिल है अरसा। अरसा भी अब प्रचलन से बाहर ही होता जा रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो अब अरसा के भी लाले पड़ने लगे हैं।

यहां शादी-ब्याह व अन्य कई शुभ अवसरों में बनने वाली उत्तराखंडी मिठाई “अरसा“अपना विशेष महत्त्व रखती है।इस मिठाई को बनाने में मुख्य रूप से चावलों व गुड़ का उपयोग होता है। लगभग 12 घंटे पहले चावलों को एक निश्चित मात्रा में एक बड़े बर्तन जिसको यहां की भाषा मे तौल कहा जाता है,में भिगाने के लिए रखा जाता है। भीगे चावलों को पानी से निकाला जाता है। तत्पश्चात महिलाओं द्वारा उरखेला में गंजलिओ से कूटकर बारीक आटा बनाया जाता है। फिर कारीगर चूल्हे में गुड़ व पानी की “पाक“ तैयार करता है। इस “पाक“ में उस चावल के आटे को अच्छी तरह मिलाया जाता है।कढ़ाई मे सरसों का तेल भरकर चूल्हे में खोलाया जाता है,फिर “पूरी“ के आकार में तैयार “पाक“ से खोलती कढ़ाई में डाल कर “अरसा“ मिठाई तैयार की जाती है।

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आज भी बमोली में मनीराम,महावीर सिंह,हर्षमोहन, सन्तन सिंह आदि कई लोग अरसा बनाने में माहिर है। शादी-ब्याह व कई शुभ अवसरों पर खूब अरसा बनाते है।
धीरे-धीरे इस पारम्परिक मिठाई को भी ग्रहण लगने लग गया है। जहां शादी-ब्याह, मायके से ससुराल जाने वाली बेटी-बहिन को बिदाई के समय तोहफे में इस मिठाई को देने का रिवाज था वो अब कम होने लगा है। लड्डू,बर्फी जैसी मिठाई इसका स्थान लेने लग गए है।
इसके कई कारण हो सकते है,जैसे पलायन। गांवो में लोग कम होने लगे है जिस कारण उरखेला में कूटकर आटा बनाने वाली महिलाएं भी नही मिल पाती। कुछ आधुनिकता के कारण बाजार से ही तैयार मिठाई लाना लोग पसंद कर रहे हैं।
कारण जो भी हो लेकिन उत्तराखंड की यह पहाड़ी मिठाई “अरसा“ अपने लुप्त होने की कगार पर आ रही है।

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