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‘आप’ दिल्ली से पहाड़ चढ़ने को आतुर | उक्रांदियों के आपस में न मिल रहे सुर |वरिष्ठ पत्रकार अजय रावत की रिपोर्ट

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CITYLIVE TODAY . MEDIA HOUSE-AJAY RAWAT

यूँ तो सूबे की सियासत पर पंजे के निशान और कमल के फूल की खुश्बू ही छाई रहती है, लेकिन यदि कांग्रेस और भाजपा से इतर इस पर्वत प्रान्त की राजनैतिक स्थिति का विश्लेषण किया जाए तो दशकों से पृथक पहाड़ी राज्य की मांग करने उक्रांद के मुकाबले फ़िलवक्त दिल्ली से आई नई नवेली “आप” सतही तौर पर बीस साबित होती नजर आ रही है।

निःसंदेह 20 बरस तक कांग्रेस व भाजपा की बारी बारी से आई सत्ता के बाद भी पहाड़ सौतेलेपन के दंश को झेल रहा है, अपने ही नाम पर बने इस छोटे से राज्य में यह ‘सौतेलापन’ यूपी के दौर से अधिक अखरता है, ऐसे में निश्चित रूप से प्रदेश के आम जन के अंतर्मन में एक मजबूत विकल्प की बात अवश्य आती है। उक्रांद भले ही दो मर्तबा नई दिल्ली के 24 अकबर रोड़ और 11 अशोका मार्ग में शरण ले सत्ताभोगी बना, भले उसके नेताओं में घोर गुटबाज़ी रही हो लेकिन जब कभी भी भाजपा व कांग्रेस के विकल्प की बात होती थी तो उक्रांद के सिवा अन्य कोई नाम लोगों की जुबान पर नहीं होता था, इधर दिल्ली की ‘आप’ ने उत्तराखंड को लेकर जो इंटरेस्ट दिखाया फिर नेहरू पर्वतारोही संस्थान के पूर्व प्रिंसिपल व फौजी मोउंटेनियर अजय कोठियाल के कंधे पर सवार हो पहाड़ चढ़ने के ऐलान कर डाला।

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आप के इन पैंतरों ने कहीं न कहीं सूबे की सियासत में तीसरे पायदान पर पंहुचने की लड़ाई को रोचक बना दिया है, जिसमे फ़िलवक्त आप बढ़त बनाती नज़र आ रही है। बहरहाल, दो राष्ट्रीय दलों के विकल्प के लिए हो रही यह खींचतान रोचक अवश्य होगी किन्तु जनहृदय की उस दबी आकांशा की पूर्ति नहीं कर पायेगी। जाने अनजाने में इनकी यह प्रतिस्पर्धा कांग्रेस और भाजपा को ही लाभ न पंहुचा दे। संकेत तो यही हैं कि कोई किसी भी पायदान पर रहे पहाड़ के उतुंग शिखर शून्य ही रहेंगे।

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