” धाद’ की पहल ” 19 नवंबर से 11 जनवरी 2025 तक ‘ माल्टे का महीना ’ अभियान |Click कर पढ़िये पूरी News

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सिटी लाइव टुडे, मीडिया हाउस

देहरादून। सामाजिक संस्था ‘धाद’ ने आम जनमानस से अपील की है कि वे सर्दियों के दिनों में अपने खानपान में पहाड़ के माल्टे और नारंगी को शामिल करें। पहाड़ों में ये फल प्राकृतिक और लगभग पूरी तरह ऑर्गेनिक रूप में पैदा होते हैं, लेकिन सही विपणन के अभाव में बाजार से गायब होते जा रहे हैं। इनका अधिकाधिक उपयोग न केवल किसानों को बाजार देगा, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूती भी प्रदान करेगा।

इसी उद्देश्य से संस्था इस वर्ष भी ‘माल्टे का महीना’ सामाजिक अभियान चला रही है। धाद की केंद्रीय समिति के अनुसार यह अभियान 19 नवंबर से 11 जनवरी तक चलेगा। इसके तहत फलों के सम्मानजनक समर्थन मूल्य, विपणन व्यवस्था और किसानों की समस्याओं पर नागरिक संवाद को बढ़ावा दिया जाएगा।

अभियान की शुरुआत जन समर्थन मूल्य पर माल्टा-नारंगी की सार्वजनिक बिक्री और शासन को मांगपत्र सौंपने से होगी। धाद आम समाज तक माल्टा पहुंचाने के लिए मोबाइल वैन और होम डिलीवरी की व्यवस्था भी करेगी। इसी अवधि में पहाड़ी फलों और बाजार व्यवस्था पर विशेषज्ञों व किसानों के साथ सार्वजनिक विमर्श आयोजित किए जाएंगे।

अभियान के दौरान कई कार्यक्रम आयोजित होंगे। 7 दिसंबर को सतपुली में माल्टा मेला, 14 दिसंबर को मालदेवता में ‘कल्यो फूड फेस्टिवल’, 29 दिसंबर और 5 जनवरी को विभिन्न स्थानों पर पहाड़ी फलों के स्वैच्छिक फेस्टिवल। हर शनिवार धाद अपने फेसबुक पेज पर ऑनलाइन बागवानी विमर्श भी आयोजित करेगी। अभियान का समापन 11 जनवरी को ‘माल्टा मकरैंण’ और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ होगा।
प्रेस वार्ता में धाद के अध्यक्ष लोकेश नवानी, सचिव तन्मय, उद्यान विशेषज्ञ डॉ. आर. पी. खुकसाल, पूर्व अध्यक्ष एच. एम. व्यास, प्रो. विनय आनंद बैड़ाई और उत्तम सिंह रावत, मेजर महाबीर रावत, सुरेश कुकरेती, हिमांशु आहूजा, नीलेश, शुभम, संजय आदि मौजूद रहे।

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दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता
धाद ने सरकार से पहाड़ी फलों और जैविक सब्जियों के लिए दीर्घकालिक उत्पादन-विपणन नीति बनाने की मांग की है। संस्था का कहना है कि राज्य में पिछले वर्ष 11 हजार हेक्टेयर में 36,900 मीट्रिक टन नींबू प्रजाति का उत्पादन हुआ, लेकिन समर्थन मूल्य उत्पादन लागत से कम होने के कारण किसानों को लाभ नहीं मिल पा रहा है। मांगपत्र में औद्यानिक विपणन परिषद की भूमिका बढ़ाने, पहाड़ी फलों की ढुलाई को सरल बनाने, बाजारों में निशुल्क क्रयदृविक्रय केंद्र खोलने, फलों का व्यवहारिक समर्थन मूल्य तय करने, सरकारी स्कूलों में स्थानीय फलों की खपत सुनिश्चित करने, निर्यात योजना तैयार करने, पैक हाउस और कोल्ड स्टोरेज पर अनुदान बढ़ाने व कीवी समेत कई फलों को सूचीबद्ध करने जैसी मांगें शामिल हैं। धाद का मानना है कि सामुदायिक भागीदारी और सरकारी सहयोग से ही पहाड़ी किसानों को उनका सम्मानजनक मूल्य और बाजार मिल सकता है।

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