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UPSC के पैटर्न पर हो यूजीसी नेट परीक्षा |Click कर पढ़िये पूरी News

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सिटी लाइव टुडे, मीडिया हाउस

भले ही नीट एग्जाम के शोर में यूजीसी नेट परीक्षा की गड़बड़ी का मामला दबा हुआ दिख रहा हो लेकिन इसकी गंभीरता किसी भी स्तर पर नीट परीक्षा से कम नहीं है। फिलहाल गड़बड़ियों और धांधलियों पर बात करने का बहुत ज्यादा औचित्य नहीं है क्योंकि अभी तक यूजीसी नेट एग्जाम को लेकर जो बातें केवल अफवाहों और चर्चाओं का विषय थीं, वे हाल के दिनों में यूजीसी द्वारा तीन विषयों की परीक्षा रद्द किए जाने के बाद काफी हद तक प्रमाणित होती दिख रही हैं। अब सवाल यह है कि इस सर्वविदित समस्या का समाधान क्या हो?

इन दिनों (अगस्त, 2026) सुप्रीम कोर्ट में नीट एग्जाम पर चल रही बहस के क्रम में न्यायालय ने सुझाव दिया है कि यह परीक्षा संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षाओं के पैटर्न पर आयोजित कराई जानी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का यह सुझाव जितना नीट परीक्षा के लिए उल्लेखनीय है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यूजीसी नेट एग्जाम की बाबत है। गौरतलब है कि नीट एग्जाम के आधार पर महज एमबीबीएस डिग्री में एडमिशन मिलता है, जबकि यूजीसी नेट की परीक्षा सीधे असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति तथा भारत सरकार की सार्वजनिक कंपनियों में अधिकारी बनने के लिए पात्रता प्रदान करती है। यह तुलनात्मक रूप में एमबीबीएस एग्जाम में एडमिशन से कहीं ज्यादा बड़ा मामला है।

गौरतलब है कि असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी भारत सरकार की ग्रुप ए की नौकरी से भी अधिक वेतनमान वाली नौकरियों में से एक है। अब से महज दो दशक पहले तक यूजीसी नेट को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था और प्रकारांतर से यह माना जाता था कि जो युवा पदों की कम संख्या के चलते संघ लोक सेवा आयोग की प्रशासनिक सेवाओं में चयनित नहीं हो पाते, वे भी अपने प्लान बी के तहत यूजीसी नेट का एग्जाम क्लियर करके उच्च शिक्षा में आते हैं। इसका भाव यही था कि यह परीक्षा भी योग्य युवाओं को आकर्षित करती है।

अब सवाल यह है कि वे क्या तरीके हो सकते हैं जिससे यूजीसी नेट एग्जाम में सेंधमारी को पक्के तौर पर रोका जा सके और इसकी प्रतिष्ठा बहाल हो सके। वास्तव में, इसका समाधान यूपीएससी की सिविल सर्विसेज परीक्षा के पैटर्न में ही छिपा हुआ है। सामान्यतः हम सभी जानते हैं कि यूपीएससी की परीक्षा तीन चरणों में होती है, जिसमें प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इसके बाद साक्षात्कार होता है। यूजीसी नेट के एग्जाम में साक्षात्कार की आवश्यकता नहीं है क्योंकि किसी विश्वविद्यालय अथवा महाविद्यालय में चयन के समय साक्षात्कार की प्रक्रिया पूरी होती है इसलिए यूजीसी नेट में केवल प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षा ही काफी होगी।

इस क्रम में सबसे पहला काम तो यह किया जाना चाहिए कि भारत में यूजीसी, आईसीएआर और आईसीएसआर द्वारा आयोजित की जाने वाली नेट/नेट-जेआरएफ परीक्षाओं को एक व्यवस्था के अंतर्गत लाया जाए। इसके साथ इन सभी परीक्षाओं में समान रूप से नेगेटिव मार्किंग का प्रावधान किया जाए ताकि तुक्का लगाने की गुंजाइश ना रहे। जहां तक इस परीक्षा को दो चरणों अर्थात प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षा के रूप में आयोजित करने की बात है तो इसे यूजीसी अपने स्तर पर अथवा NTA के माध्यम से आयोजित कर सकती है। पहले चरण में मौजूदा परीक्षा योजना के प्रथम प्रश्न पत्र को ज्यों का त्यों रखा जाए तथा दूसरा प्रश्न पत्र चयनित विषय पर केंद्रित हो। ये दोनों प्रश्न पत्र ऑब्जेक्टिव स्वरूप के रखे जा सकते हैं। मुख्य परीक्षा में भी दो प्रश्न पत्र ही रखे जाएं और ये दोनों प्रश्न पत्र विस्तृत उत्तरीय होने चाहिए। इनमें एक प्रश्न भाषा दक्षता पर आधारित होना जरूरी है। वह इसलिए कि शिक्षक का माध्यम कोई भी भाषा हो, उसमें न्यूनतम स्तर की भाषिक योग्यता आवश्यक है। मौजूदा नेट परीक्षा में भाषा संबंधी दक्षता का कोई अलग प्रश्न पत्र निर्धारित नहीं है। इसी प्रश्न पत्र में अकादमिक लेखन दक्षता भी जांची जाए।

जहां तक भाषा के चयन की बात है तो हिंदी, अंग्रेजी सहित भारत की अन्य अनुसूचित भाषाओं का भी विकल्प प्रदान किया जा सकता है। मुख्य परीक्षा का दूसरा प्रश्न पत्र संबंधित विषय पर केंद्रित रखना चाहिए। इसमें रिसर्च कंपोनेंट पर विशेष रूप से फोकस किया जाए।

सैद्धांतिक दृष्टि से देखें तो यूजीसी नेट का उद्देश्य उच्च शिक्षा में अत्यधिक योग्य युवाओं की पहचान करना है।
इसलिए इस परीक्षा में शामिल होने की न्यूनतम योग्यता पर भी पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता है। वर्तमान में सामान्य वर्ग के लिए स्नातकोत्तर उपाधि में 55 प्रतिशत और आरक्षित वर्गों के लिए 50 प्रतिशत का नियम लागू है। इसके साथ अंक प्रतिशत की यह अनिवार्यता स्नातक उपाधि के मामले में भी लागू की जानी चाहिए। गौरतलब है कि सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति के संदर्भ में API (Academic Performance Indicator) के निर्धारण के क्रम में उन युवाओं को स्नातक उपाधि के आधार पर कोई अंक प्रदान नहीं किया जाता जिनके 45 प्रतिशत से कम अंक होते हैं। इसके दृष्टिगत भी यह व्यवस्था की जा सकती है कि सामान्य वर्ग के लिए 50 प्रतिशत एवं आरक्षित वर्ग के लिए 45 प्रतिशत अंक स्नातक उपाधि में होने भी आवश्यक कर दिए जाएं। मुख्य परीक्षा के लिए कितने प्रतिशत युवाओं को आमंत्रित किया जाए, इसका निर्धारण भी संघ लोक सेवा आयोग के नियमों को ध्यान में रखकर किया जा सकता है।

दो चरण वाली इस परीक्षा से यूजीसी और NTA पर बोझ बढ़ने के संदर्भ को भी देख सकते हैं। इसका एक उपाय यह हो सकता है कि वर्तमान में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा आयोजित की जाने वाली स्टेट लेवल की SET/SLET परीक्षाओं को यूजीसी नेट की प्रारंभिक परीक्षा का विकल्प बना दिया जाए। यूजीसी के निर्देशों के क्रम में देश के सभी बड़े राज्य SET/SLET परीक्षाएं आयोजित करें। चूंकि इन परीक्षाओं में किसी भी राज्य के युवा भाग ले सकते हैं इसलिए यदि कुछ छोटे राज्य यह परीक्षा आयोजित नहीं कराते तो उनके युवा आसपास के राज्यों में होने वाली ऐसी परीक्षा में सम्मिलित हो सकते हैं।

इन राज्य स्तरीय परीक्षाओं में सफल होने वाले युवाओं को सीधे यूजीसी की मुख्य परीक्षा में भाग लेने का अवसर प्रदान किया जा सकता है। इससे यूजीसी नेट परीक्षा का स्वरूप काफी हद तक विकेंद्रीकृत हो जाएगा और उसमें सेंधमारी की आशंका तुलनात्मक रूप से कम हो जाएगी। इस परीक्षा के मामले में एक और पहलू पर ध्यान दिया जाना चाहिए। वो ये कि ज्यादातर राज्यों में सहायक प्रोफेसर की भर्ती की अधिकतम उम्र सीमा 35 से 40 साल के बीच है। (हालांकि विश्वविद्यालयों में नियुक्ति के समय उम्र का बंधन नहीं होता।) ऐसे में 40 साल से अधिक उम्र के किसी व्यक्ति के यूजीसी नेट परीक्षा में बैठने का कोई तार्किक औचित्य प्रतीत नहीं होता। आयु सीमा लगाने के साथ-साथ इसमें प्रयासों की सीमा भी निर्धारित की जानी चाहिए जैसे कि संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में निर्धारित है। यह सामान्य वर्गों के लिए चार और अन्य आरक्षित वर्गों के लिए पांच अथवा छह रखी जा सकती है। संख्या घटने से परीक्षा की गुणवत्ता और शुचिता सकारात्मक रूप से परिवर्तित होने की संभावना पैदा होगी।

इस परीक्षा से जुड़े कुछ और पहलू भी हैं, जिन पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है। जैसे, प्रश्नपत्र तैयार करने वाले विशेषज्ञों की पहचान को गोपनीय रखने, प्रश्नपत्रों के डिजिटल ट्रांसमिशन तथा अंतिम समय तक प्रश्नपत्र की सुरक्षा के लिए UPSC जैसी बहुस्तरीय व्यवस्था विकसित की जाए। सीमित संख्या में विशेषज्ञों पर निर्भरता समाप्त करके विषय विशेषज्ञों का बड़ा और अधिक गोपनीय पैनल बनाया जाए तथा फाइनल प्रश्नपत्र का चयन बहुस्तरीय प्रक्रिया से हो।

इस परीक्षा में नॉर्मलाइजेशन की पारदर्शी व्यवस्था बहुत जरूरी है। इसे लेकर आवेदकों में अक्सर संदेह रहता है। यदि अलग-अलग चरणों या अलग-अलग प्रश्नपत्रों के कारण कठिनाई के स्तर में अंतर होता है तो अंकों के सामान्यीकरण की स्पष्ट और पूर्व घोषित वैज्ञानिक पद्धति होनी चाहिए। मुख्य परीक्षा में रिसर्च एप्टीट्यूड को व्यापक महत्व दिए जाना जरूरी है। केवल विषय का ज्ञान पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए। उच्च शिक्षा के भावी शिक्षकों की शोध-दृष्टि, आलोचनात्मक चिंतन और अकादमिक लेखन की क्षमता भी जांची जानी चाहिए।

साथ ही, JRF को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की भी जरूरत है। नेट, जेआरएफ और असिस्टेंट प्रोफेसर पात्रता को एक ही परिणाम में रखने की बजाय उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थियों के लिए अलग और अधिक प्रतिस्पर्धी स्तर निर्धारित किया जा सकता है। चूंकि JRF के आधार पर देश की नवरत्न कंपनियां भी सीधे चयन करती हैं इसलिए यह बिंदु और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।

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यकीनन, यूजीसी नेट में सुधार का प्रश्न केवल एक परीक्षा को भ्रष्टाचार-मुक्त बनाने का प्रश्न नहीं है, यह तय करने का प्रश्न है कि भारत भविष्य के विश्वविद्यालय शिक्षक और शोधकर्ता की गुणवत्ता का निर्धारण किस आधार पर करेगा। हालांकि ये तमाम बातें एक विचार के रूप में हैं। इन्हें व्यावहारिक रूप से अमली जामा पहनाते वक्त अन्य जरूरी बदलाव भी किए जा सकते हैं।

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