मांगल गीतों ने किया पलायन| गुमनामी के अंधेरे का बनाया ठिकाना| कमल उनियाल की Report

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सिटी लाइव टुडे, कमल उनियाल, द्वारीखाल


अपने उत्तराखंड में पलायन का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। लोक परंपराओं का भी पलायन हुआ है। ये परंपरा पलायन शहर नहीं जा रही हैं बल्कि समाप्त ही हो जा रही हैं। मांगल गीतों का भी ऐसा ही हाल है। मांगल गीतों ने भी पलायन कर दिया है। मांगलिक गीतों ने पलायन अपना ठिकाना ना जाने कहां बना लिया है। इससे संस्कृति प्रेमी चितिंत हैं। हालांकि मांगल गीतों को संरक्षित रखने के प्रयास भी हो रहे हैं लेकिन यह भी सच ही है कि युवा पीढ़ी इन मांगल गीतों से किनारा कर रही है।

देवभूमि उत्तराखंड सदैव देवी देवताओ की भूमि पावन शान्तिप्रिय प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए भारत वर्ष में जाना जाता है। यहाँ की लोक संस्कृति, भाई चारा मेल मिलाप तथा स्थानीय पर्व मनाने की सभ्यता अपने आप में बेमिसाल है। लेकिन जैसे जैसे पलायन तथा शहरो की और प्रवास कर रहे यहाँ के निवासियों ने अपनी संस्कृति, बोली भाषा, पहनावा रहन सहन का असितत्व भी तेजी खो रहे हैं।


हमारी संस्कृति में वैदिक परम्परा के अनुसार किसी भी शुभ कार्य करने के लिए अपने पूर्वजो तथा कुल देवताआंे को स्मरण करने का माध्यम होता था। हमारी मुख्य संस्कृति हमारी गढवाली भाषा शादी ब्याह में मांगल गीत, फसल पकने पर थडिया गीत, झुमेलो अब कही नही सुनायी देते हैं। जिस तरह हम जीवन की अंधी दौड में दौड रहे हैं उसी तरह हमने अपनी संस्कृति का मुख्य पारम्परिक शादी में गाये जाने वाला मांगल गीत को भी हाशिये में डाल दिया है।

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आजकल मांगल गीत नही सुनायी देते। पर्वतीय क्षेत्रों में शादी के शुभ अवसर पर गाये जाने वाला मांगल गीत इतने कारुणिक ढंग से गाया जाता था कि दुल्हन तो दूर गांव वाले से लेकर सभी सगे समन्धी भी अपने
आँसू नहीं रोक पाते थे।
दे दय्या बाबा जी, कन्या क दाना।
तुम होल्या बाबा जी, पुण्य क भागी ये।
देणा होयाँ, खोली का गणेश,
देणा होयाँ, मोरी क नारेण ये।

इस तरह के माँगल गीत वधू पक्ष के लोगो के लिए सबसे भावुक पल होता था। ग्रामीण भारत नेगी मनोज नेगी अजय डोबरियाल, सूमा देवी, रामी देबी ने कहा शादी ब्याह में गाये जाने वाला मांगल गीत की अलग ही पहचान थी। जो दुल्हन पक्ष के महिलाओ द्वारा सामूहिक रुप गाया जाता था। पर अब आधुनिक दौर में हमारी पुरानी संस्कृति लुप्त हो गयी है जो चिन्तनीय का विषय है।

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